दर्जनों गांवों में नेटवर्क नहीं, पहाड़ चढ़ शिक्षक बनाते हैं अटेंडेंस, एंबुलेंस बुलाना भी मुश्किल

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News Ashok Anant Edit by Sunil

हाजिरी के लिए पहाड़ चढ़ते गुरुजी, इलाज के लिए पेड़ पर लटके सिग्नल; ये कैसा डिजिटल इंडिया?

चतरा : एक वक्त था जब झारखंड के चतरा जिले का नाम आते ही जेहन में ‘लाल आतंक’ की खौफनाक तस्वीर उभरती थी। नक्सलवाद ने यहाँ के विकास की हर ईंट को सालों तक रोक कर रखा। लेकिन आज, जब बंदूकें खामोश हैं और नक्सलवाद आखिरी सांसें ले रहा है, तब भी चतरा के सुदूरवर्ती जंगलों तक विकास की किरण नहीं पहुँच पाई है। केंद्र सरकार का ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान जहाँ देश को 5G से जोड़ रहा है, वहीं चतरा के कुंदा, प्रतापपुर और लावालौंग प्रखंड के दर्जनों गांवों के लिए एक फोन कॉल करना आज भी किसी ‘पहाड़ तोड़ने’ जैसा दुष्कर कार्य है। यहाँ के बिरहोर, गंझू और भोक्ता समाज के लोग नेटवर्क पाने के लिए आज भी ऊंचे पेड़ों पर चढ़ते हैं। आखिर क्या वजह है कि तकनीक के इस स्वर्णिम युग में भी चतरा का एक बड़ा हिस्सा आदिम जीवन जीने को मजबूर है? देखिए हमारी यह विशेष रिपोर्ट।

झारखंड के चतरा जिले का कुंदा प्रखंड, जहाँ के 78 गांवों में से करीब 30 गांव आज भी ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ का शिकार हैं। बात करें प्रतापपुर प्रखंड की, तो यहाँ के 148 गांवों में से कुटिल, मरगड़ा, एकता और दारी जैसे गांवों में मोबाइल फोन केवल एक ‘खिलौना’ बनकर रह गया है। वहीं, लावालौंग प्रखंड के 95 गांवों में से करीब 20 गांवों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। यहाँ किसी रिश्तेदार से बात करनी हो या अस्पताल में एम्बुलेंस को फोन करना हो, ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर ऊंचे पेड़ों या दुर्गम पहाड़ों की चोटियों पर चढ़ना पड़ता है। आलम यह है कि मोबाइल से सिग्नल पाने के लिए लोग घंटों ऊंचाई पर खड़े रहकर हवा में फोन लहराते हैं। यह तस्वीर आज के आधुनिक भारत की उस बदहाली को उजागर करती है जहाँ तकनीक सिर्फ कागजों और विज्ञापनों तक सीमित है।

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