बैकयार्ड कुक्कुट पालन में महिला किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका : डा रक्षित

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कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, गरखटंगा परिसर में बत्तख प्रशिक्षण एवं वितरण,
नामकुम: भा.कृ.अनु.प.भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, गरखटंगा परिसर में बत्तख प्रशिक्षण एवं वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित ने किया। वही जिसमें डॉ. विजय पाल भडाना संयुक्त निदेशक अनुसंधान और डॉ. किशोर कुमार कृष्णानी संयुक्त निदेशक शैक्षणिक उपस्थित रहे।
यह कार्यक्रम संस्थान की जनजातीय उप योजना (ळरढ) के तहत आयोजित किया गया। जिसका उद्देश्य रांची जिले के आसपास के गांवों में आदिवासी किसान भाई बहनों में बत्तख पालन को बढ़ावा देना था। इस कार्यक्रम में लगभग 30 लाभार्थियों को खाकी कैंपबेल बत्तखों के पालन पर प्रशिक्षित किया गया और उन्हें 28 दिन आयु की 10-10 बत्तखें प्रदान की गईं। इस इस कार्यक्रम का आयोजन और समन्वय डॉ. सौमजीत सरकार, डॉ. के. आर. सोरेन, और डॉ. सुजय बी. के. द्वारा किया गया। इस अवसर पर बोलते हुए, डॉ. सुजय रक्षित ने वैज्ञानिक बत्तख पालन के महत्व पर जोर दिया और बैकयार्ड कुक्कुट पालन में महिला किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया। डॉ. रक्षित ने प्रशिक्षुओं को इस प्रशिक्षण का अधिकतम लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया और भविष्य में किसानों को संस्थान से सभी प्रकार की सहायता प्रदान करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की विधियों को अपनाने से किसान पर्यावरणीय परिवर्तनों के साथ तालमेल बिठा सकते हैं और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित कर सकते हैं। डॉ. भडाना ने झारखंड की जलवायु परिस्थितियों में खाकी कैंपबेल बत्तख के महत्व को रेखांकित किया और उपस्थित लोगों को इस दिशा में विविधता अपनाने के लिए प्रेरित किया। डॉ. कृष्णानी ने मिश्रित कृषि के महत्व और जलवायु-अनुकूल पशुपालन प्रथाओं की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए।
बत्तख पालन में उद्यमशीलता की पहल को प्रोत्साहित करने के लिए, स्थानीय बत्तख पालक किसान महबूब आलम को आमंत्रित किया गया, जिन्होंने बत्तखों के प्रबंधन, देखभाल और संचालन पर अपने विचार साझा किए। इस आयोजन का उद्देश्य प्रतिभागियों को बत्तख पालन को सिर्फ एक पूरक आय के स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़ा और स्थायी व्यवसायिक अवसर के रूप में देखने के लिए प्रेरित करना था। खाकी कैंपबेल बत्तख, जो अपनी सहनशक्ति और अंडा उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं, इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहीं। ये बत्तखें प्रति वर्ष 280-300 अंडे देने में सक्षम होती हैं, जो मुर्गियों के मुकाबले आकार में अधिक और अधिक विक्री क्षमता वाले होते हैं। इस नस्ल की एक और विशिष्ट विशेषता यह है कि इन्हें पालन के लिए बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है, जो झारखंड जैसे क्षेत्रों के लिए आदर्श है, जहां जल संसाधनों की कमी हो सकती है। जलवायु परिवर्तन से पारंपरिक खेती में आ रही चुनौतियों के मद्देनजर, खाकी कैंपबेल बत्तखों को झारखंड के कृषि परिदृश्य के लिए अत्यधिक उपयुक्त माना गया है। जलवायु अस्थिरता के समय में इनका पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूलन क्षमता ग्रामीण किसानों के लिए एक विश्वसनीय आय का स्रोत बन सकती है।

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