बीमारी से हार गईं खालिदा जिया, छोड़ गईं मजबूत राजनीतिक विरासत

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Eksandeshlive Desk

ढाका : बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष और देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री खालिदा जिया अपने पीछे मजबूत राजनीतिक विरासत छोड़ गई हैं। उनका मंगलवार सुबह ढाका के एवरकेयर अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। बीएनपी के फेसबुक पेज पर कहा गया है, ”खालिदा जिया का निधन सुबह करीब 6:00 बजे फज्र की नमाज के ठीक बाद हुआ।” बीएनपी महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने भी उनके निधन की पुष्टि की। द डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार, 80 वर्षीय खालिदा को 23 नवंबर को एवरकेयर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह दिल और फेफड़ों के संक्रमण से पीड़ित थीं। वह निमोनिया से भी जूझ रही थीं। इसी साल छह मई को एडवांस मेडिकल केयर लेने के बाद लंदन से लौटने के बाद से खालिदा की एवरकेयर अस्पताल में नियमित जांच हो रही है। खालिदा ने 1991 के आम चुनाव में जीत के बाद देश का नेतृत्व संभाला। वह अपने बेटे तारिक, उनकी पत्नी और उनकी बेटी को पीछे छोड़ गईं। तारिक रहमान 17 साल के निर्वासन के बाद 25 दिसंबर को बांग्लादेश लौटे। खालिदा के छोटे बेटे अराफात रहमान कोको की कुछ साल पहले मलेशिया में मौत हो चुकी है। पूर्व प्रधानमंत्री को 08 फरवरी, 2018 को भ्रष्टाचार के एक मामले में जेल भेजा गया। कोरोनाकाल में उन्हें 25 मार्च, 2020 को कुछ शर्तों पर अस्थायी रिहाई दी गई। खालिदा का जन्म 1945 में जलपाईगुड़ी में हुआ था। उन्होंने शुरू में दिनाजपुर मिशनरी स्कूल में पढ़ाई की और बाद में 1960 में दिनाजपुर गर्ल्स स्कूल से मैट्रिक किया।

रहमान की हत्या के बाद मुश्किल समय में खालिदा पार्टी में शामिल हुईं : खालिदा के पिता इस्कंदर मजूमदार व्यापारी और मां तैयबा मजूमदार घरेलू महिला थीं। पुतुल के नाम से मशहूर खालिदा तीन बहनों और दो भाइयों में दूसरी थीं। 1960 में उनकी शादी जिया-उर-रहमान से हुई। रहमान पाकिस्तान आर्मी में कैप्टन थे। 1971 के मुक्ति युद्ध में जिया-उर-रहमान ने विद्रोह किया और युद्ध में हिस्सा लिया। 30 मई, 1981 को रहमान की हत्या के बाद बीएनपी गंभीर संकट में फंस गई। इस मुश्किल समय में खालिदा पार्टी में शामिल हुईं और 12 जनवरी, 1984 को उपाध्यक्ष बनीं। उन्हें 10 मई, 1984 को अध्यक्ष चुना गया। खालिदा जिया के नेतृत्व में बीएनपी ने 1983 में लाक पार्टियों का गठबंधन बनाया और इरशाद की तानाशाही सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। खालिदा ने बिना डरे इरशाद के खिलाफ आंदोलन जारी रखा। 1991 के चुनाव में बीएनपी अकेली बहुमत वाली पार्टी के तौर पर उभरी। खालिदा ने लगातार तीन संसदीय चुनाव में पांच सीटों से चुनाव लड़ा और सभी पर जीत हासिल की। 20 मार्च, 1991 को खालिदा ने बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली। खालिदा 15 फरवरी, 1996 को हुए आम चुनाव में जीत के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं। हालांकि, सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने चुनाव का बहिष्कार किया था। विपक्षी पार्टियों की मांग के सामने तत्कालीन सरकार ने संसदीय चुनाव कराने के लिए एक निष्पक्ष कार्यवाहक सरकार का प्रावधान करने के लिए संविधान में संशोधन किया। इसके बाद संसद भंग कर दी गई और 30 मार्च, 1996 को खालिदा ने कार्यवाहक सरकार को सत्ता सौंप दी। 12 जून, 1996 को जस्टिस मोहम्मद हबीबुर रहमान की अध्यक्षता वाली कार्यवाहक सरकार के तहत हुए चुनाव में बीएनपी को अवामी लीग से हार का सामना करना पड़ा। अवामी लीग सरकार के 1996-2001 के कार्यकाल के दौरान खालिदा जातीय संसद में विपक्ष की नेता रहीं।

इस साल 06 अगस्त को बीएपनी प्रमुख पूरी तरह रिहा की गई थीं : 1 अक्टूबर, 2001 को जस्टिस लतीफुर रहमान की अध्यक्षता वाली कार्यवाहक सरकार के तहत हुए अगले संसदीय चुनाव में बीएनपी के नेतृत्व वाले चार दलों के गठबंधन ने जातीय संसद में दो-तिहाई से अधिक सीटें जीतीं। 10 अक्टूबर, 2001 को खालिदा ने तीसरी बार देश की प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। 2007 में जब सेना समर्थित कार्यवाहक सरकार ने सत्ता संभाली तो खालिदा को अवामी लीग की अध्यक्ष शेख हसीना सहित कई अन्य राजनीतिक नेताओं के साथ जेल भेज दिया गया। बाद में उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया और उन्होंने 2008 के संसदीय चुनाव में हिस्सा लिया, लेकिन उनकी पार्टी जीत नहीं पाई।2014 के संसदीय चुनाव में बीएनपी ने हिस्सा नहीं लिया और 1991 के बाद पहली बार पार्टी संसद से बाहर हो गईं। 08 फरवरी, 2018 को ढाका की एक विशेष अदालत ने जिया अनाथालय ट्रस्ट भ्रष्टाचार मामले में उन्हें पांच साल जेल की सजा सुनाई। इसी साल 30 अक्टूबर को उच्च न्यायालय ने उनकी जेल की सजा बढ़ाकर 10 साल कर दी। बाद में उन्हें जिया चैरिटेबल ट्रस्ट भ्रष्टाचार मामले में भी दोषी ठहराया गया। कोरोना काल में तत्कालीन अवामी लीग सरकार ने 25 मार्च, 2020 को एक कार्यकारी आदेश के जरिए खालिदा को अस्थायी रूप से रिहा कर दिया। उनकी सजा इस शर्त पर निलंबित की गई कि वह अपने गुलशन वाले घर में रहेंगी और देश छोड़कर नहीं जाएंगी। इस साल 06 अगस्त को बीएपनी प्रमुख को पूरी तरह से रिहा कर दिया गया।

पूर्व प्रधानमंत्री की नमाज-ए-जनाजा बुधवार को, तीन दिन का राजकीय शोक : बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष खालिदा जिया की नमाज-ए-जनाजा बुधवार को होगी। मुख्य सलाहकार प्रो. मोहम्मद यूनुस ने दोपहर को राष्ट्र के नाम संबोधन में बेगम खालिदा जिया के निधन पर कल से तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की। उन्होंने उनके नमाज-ए-जनाजा के दिन कल आम छुट्टी की भी घोषणा की। बांग्लादेश के समाचार पोर्टल बीएसएस और द डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने बांग्लादेश टेलीविजन और बांग्लादेश बेतार पर दोपहर 12 बजे एक साथ प्रसारित टेलीविजन संबोधन में कहा, ”पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के निधन पर मैं तीन दिन के राजकीय शोक और उनके नमाज-ए-जनाजा के दिन कल एक दिन की सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा करता हूं।” मुख्य सलाहकार ने जनाजा और शोक के दौरान सभी से अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने का आग्रह किया। प्रो. यूनुस ने कहा, ”मुझे पता है कि आप सभी इस समय बहुत दुखी हैं। मुझे उम्मीद है कि आप शोक के इस समय में धैर्य दिखाएंगे और उनके नमाज-ए-जनाजा सहित सभी औपचारिकताओं को पूरा करने में शामिल सभी संबंधित लोगों का सहयोग करेंगे।” उन्होंने कहा, ”सर्वशक्तिमान अल्लाह हमें धैर्य, शक्ति और एकजुट रहने की क्षमता दे।” इससे पहले स्टेट गेस्ट हाउस जमुना में मुख्य सलाहकार प्रो. मोहम्मद यूनुस की अध्यक्षता में सलाहकार परिषद की विशेष बैठक हुई। बैठक में बेगम खालिदा जिया की दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। बैठक में कल से तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा करने और कल एक दिन की छुट्टी रखने का फैसला किया गया।

खालिदा को उनके पति दिवंगत जिया के बगल में दफनाया जाएगा : बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर भी बैठक में शामिल हुए। उन्होंने परिवार और पार्टी की तरफ से अंतरिम सरकार का आभार जताया और खालिदा जिया को सुरक्षा समेत सभी जरूरी मदद देने के लिए मुख्य सलाहकार को धन्यवाद दिया। मुख्य सलाहकार ने पुरानी यादों को साझा करते हुए कहा, ”मैं उनसे आखिरी बार 21 नवंबर को सशस्त्र सेना दिवस पर मिला था। उस दिन वह बहुत खुश थीं। उन्होंने मुझसे काफी देर तक बात की। उन्होंने मेरे और मेरी पत्नी के स्वास्थ्य के बारे में पूछा। वह खुद बीमार थीं, लेकिन उन्हें सभी की भलाई की चिंता थी। वह हमारे साथ थीं। देश के इस महत्वपूर्ण क्षण में, जब हम सभी को एकजुट रहना चाहिए, उनकी उपस्थिति बहुत जरूरी थी। उनका जाना देश के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है।” खालिदा जिया को उनके पति दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति जिया-उर-रहमान के बगल में शेर-ए-बांग्ला नगर के जिया उद्यान में दफनाने की तैयारियां चल रही हैं। रहमान की कब्र के बगल में और पूरब दिशा में कब्र तैयार की जा रही है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों के सदस्यों को इलाके में और उसके आसपास तैनात किया गया है। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के निधन पर गहरा दुख और शोक व्यक्त किया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के संयुक्त महासचिव रुहुल कबीर रिजवी ने घोषणा की कि पार्टी सात दिन शोक मनाएगी। उन्होंने कहा कि पूरे देश में पार्टी के सभी ऑफिसों पर काले झंडे फहराए जाएंगे। शोक की अवधि के दौरान पार्टी के नेता और कार्यकर्ता काले बैज पहनेंगे।

खालिदा और हसीना के बीच घूमती रही है बांग्लादेश की राजनीति : बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का राजनीतिक जीवन उतार-चढ़ाव भरा रहा है। खालिदा जिया 1991 से 1996 और 2001 से 2006 तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं। वह पूर्व राष्ट्रपति जिया-उर-रहमान की पत्नी हैं। उनके बड़े बेटे तारिक रहमान बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं। बांग्लादेश की राजनीति दो महिला नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है। वो हैं अवामी लीग की शेख हसीना और बीएनपी की खालिदा जिया। दोनों कभी दोस्त रही हैं। शेख हसीना का तख्तापलट हो चुका है। वह बांग्लादेश छोड़ चुकी हैं। 1980 के दशक में बांग्लादेश में सैन्य शासन था। तब सैन्य शासन के खिलाफ हसीना और खालिदा सड़क पर साथ-साथ आंदोलन किया करती थीं। 1990 में तानाशाह इरशाद की विदाई के बाद लोकतंत्र लौटा। 1991 में खालिदा जिया चुनाव जीतीं। इसके बाद खालिदा और शेख हसीना के बीच राजनीतिक दुश्मनी बढ़ गई। साल 1990 के बाद बांग्लादेश में जब भी चुनाव हुए सत्ता या तो खालिदा जिया के पास गई या शेख हसीना के पास। मीडिया इसे ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ यानी दो बेगमों की लड़ाई का नाम देता रहा। 1971 में बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई हुई। इस दौरान शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान गिरफ्तार कर लिए गए। इसी समय जिया-उर-रहमान ने रेडियो पर एक घोषणा पढ़ी। उन्होंने बताया कि वे ‘स्वतंत्र बांग्लादेश’ की ओर से लड़ रहे हैं। जंग खत्म होने के बाद जब बांग्लादेश बना तो रहमान वापस सेना में लौटे। उन्हें सेना में बड़ा पद मिला। रहमान राजनीतिक रूप से भी प्रभावशाली चेहरे के रूप में देखे जाने लगे। 1975 में शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार की हत्या के बाद देश में लगातार तख्तापलट होता रहा। सेना में गुटबाजी इतनी बढ़ी कि कुछ ही महीनों में कई बार सत्ता बदली। इस अस्थिर माहौल में जिया-उर-रहमान धीरे-धीरे सबसे ताकतवर सैन्य नेता बनकर उभरे और 1977 में वे देश के राष्ट्रपति बन गए। सत्ता संभालने के बाद उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) नाम से एक नया राजनीतिक दल बनाया।

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