बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान, मेसरा को ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग पर प्रतिष्ठित एएनआरएफ कोर रिसर्च ग्रांट प्राप्त

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Eksandeshlive Desk

रांची : बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान, मेसरा ने भारत की हरित प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान को भारत सरकार की अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन से अत्यंत प्रतिस्पर्धी कोर रिसर्च ग्रांट (CRG/2022/006243) प्राप्त हुई है। यह अनुदान “इलेक्ट्रॉनिक कचरे से कीमती धातुओं (तांबा एवं चांदी) की पुनर्प्राप्ति हेतु बायोलीचिंग प्रक्रिया: परिपत्र अर्थव्यवस्था की दिशा में” शीर्षक वाली परियोजना के लिए प्रदान किया गया है। इस परियोजना का उद्देश्य परित्यक्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से मूल्यवान धातुओं के निष्कर्षण की प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव लाना है।

इलेक्ट्रॉनिक कचरा, जिसे ई-वेस्ट कहा जाता है, आज विश्व में सबसे तेजी से बढ़ने वाले अपशिष्ट स्रोतों में से एक बन चुका है। इसका मुख्य कारण तकनीकी उपकरणों का तेजी से पुराना होना और उपभोक्ताओं द्वारा इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की बढ़ती खपत है। ई-वेस्ट में तांबा, चांदी और सोने जैसी बहुमूल्य धातुएं प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं, लेकिन पारंपरिक रीसाइक्लिंग प्रक्रियाएं अक्सर ऊर्जा-सघन स्मेल्टिंग या कठोर रासायनिक लीचिंग तकनीकों पर निर्भर करती हैं। ये विधि न केवल अत्यधिक ऊर्जा की खपत करती हैं, बल्कि पर्यावरण में विषैले उप-उत्पाद भी छोड़ती हैं। भारत में प्रतिवर्ष 16 लाख टन से अधिक ई-वेस्ट उत्पन्न होता है, ऐसे में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल धातु पुनर्प्राप्ति समाधानों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। संस्थान की शोध टीम इस चुनौती का समाधान प्रस्तुत करने के लिए समर्पित रूप से कार्य कर रही है। इस परियोजना का नेतृत्व प्रधान अन्वेषक (PI) डॉ. मुथु कुमार संपथ कर रहे हैं। सह-प्रधान अन्वेषक (Co-PI) प्रो. वी. के. निगम हैं, जबकि सुश्री बनही हलदर इस परियोजना में प्रमुख अन्वेषक एवं शोधार्थी के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। यह शोध बायोलीचिंग पर केंद्रित है, जो एक उभरती हुई जैव-प्रौद्योगिकी है और प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके जटिल अपशिष्ट पदार्थों से धातुओं को घोलने में सक्षम बनाती है।

पारंपरिक धातु निष्कर्षण तकनीकों के विपरीत, बायोलीचिंग एक ऊर्जा-कुशल, पर्यावरण-अनुकूल और लागत-प्रभावी प्रक्रिया है। इस तकनीक में प्रयुक्त सूक्ष्मजीव इलेक्ट्रॉनिक कचरे के कतरनों से तांबा और चांदी जैसी धातुओं को चयनात्मक रूप से अलग करते हैं, जिससे आक्रामक रसायनों की आवश्यकता नहीं पड़ती। शोध टीम का लक्ष्य सूक्ष्मजीवों की उपयुक्त किस्मों और प्रक्रिया की परिस्थितियों को अनुकूलित करना है, ताकि इस तकनीक को औद्योगिक स्तर पर लागू किया जा सके। यह परियोजना भारत के परिपत्र अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) मॉडल की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें संसाधनों का पुनः उपयोग, पुनर्चक्रण और उत्पादन चक्र में पुनः समावेशन किया जाता है, बजाय उन्हें अपशिष्ट के रूप में त्यागने के। ई-वेस्ट से धातुओं की जैविक विधि द्वारा पुनर्प्राप्ति से पारंपरिक खनन पर निर्भरता कम हो सकती है, जो वनों की कटाई, जल प्रदूषण और पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण से जुड़ा हुआ है। पर्यावरणीय लाभों के साथ-साथ इस परियोजना में आर्थिक संभावनाएं भी निहित हैं। जैसे-जैसे उद्योग हरित और टिकाऊ विनिर्माण प्रक्रियाओं की ओर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे पर्यावरण-अनुकूल तरीकों से प्राप्त कच्चे माल की मांग भी बढ़ेगी। इस शोध के परिणाम भारतीय उद्योगों को कम-प्रभाव वाली प्रक्रियाओं से प्राप्त महत्वपूर्ण धातुओं की आपूर्ति कर प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त प्रदान कर सकते हैं।

यदि इस तकनीक को सफलतापूर्वक बड़े पैमाने पर लागू किया जाता है, तो संस्थान का यह बायोलीचिंग शोध पूरे देश में ई-वेस्ट प्रबंधन के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकता है। बढ़ती इलेक्ट्रॉनिक खपत के दौर में, टिकाऊ रीसाइक्लिंग तकनीकें प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और अनियमित ई-वेस्ट निपटान से उत्पन्न पर्यावरणीय खतरों को कम करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। एन.आर.एफ का यह सहयोग पर्यावरणीय स्थिरता के लिए वैज्ञानिक नवाचार को दी जा रही राष्ट्रीय प्राथमिकता को दर्शाता है। संस्थान के लिए यह अनुदान जैव-प्रौद्योगिकी, पर्यावरण अभियांत्रिकी और टिकाऊ संसाधन पुनर्प्राप्ति के क्षेत्र में उसकी बढ़ती नेतृत्व भूमिका को सुदृढ़ करता है। जैसे-जैसे यह परियोजना आगे बढ़ेगी, शोध टीम को विश्वास है कि उनका कार्य भारत को स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और अधिक संसाधन-कुशल भविष्य की ओर अग्रसर करेगा। यह पहल न केवल वैज्ञानिक प्रगति का प्रतीक है, बल्कि जिम्मेदार अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के प्रति देश की प्रतिबद्धता को भी मजबूत करती है।

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