एंबुलेंस नहीं मिली तो बेटे का शव थैले में टांग कर ले गया पिता, घटना पर स्वास्थ्य मंत्री सख्त, जांच के दिए आदेश

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Eksandeshlive Desk

पश्चिमी सिंहभूम/ रांची : झारखंड में एक गरीब आदिवासी पिता को अपने चार साल के बेटे का शव अस्पताल से घर ले जाने के लिए एंबुलेंस तक नसीब नहीं हुई। मजबूरी में पिता ने बेटे की लाश एक थैले में रखी और बस से लंबा सफर तय कर गांव तक पहुंचा। यह दृश्य जिसने भी देखा, उसकी आंखें भर आईं और दिल भारी हो गया। इस कथित घटना को लेकर सामने आई खबरों पर झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने कड़ा रुख अपनाया है। मामले के संज्ञान में आते ही उन्होंने संबंधित प्राधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही पूरे प्रकरण की सच्चाई सामने लाने के लिए चाईबासा के सिविल सर्जन से विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की गई है। स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट किया कि विभाग में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जांच में यदि कोई दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि सरकार जनता के स्वास्थ्य और सम्मान को सर्वोपरि मानते हुए काम कर रही है और किसी भी तरह की कोताही पर कड़ा कदम उठाया जाएगा।

पूरे विभाग को मीडिया ट्रायल के माध्यम से बदनाम करना उचित नहीं : इरफान अंसारी ने चिंता जताई कि चाईबासा और पलामू जैसे जिलों को लेकर लगातार नकारात्मक और भ्रामक खबरें फैलाने की कोशिश की जा रही है, जिससे न केवल सरकार की छवि प्रभावित होती है, बल्कि ईमानदारी से कार्य कर रहे डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों का मनोबल भी टूटता है। उन्होंने कहा कि दुर्गम क्षेत्रों में पहले ही डॉक्टरों की भारी कमी है और इस तरह का माहौल स्थिति को और कठिन बना देता है। स्वास्थ्य मंत्री ने जनता और मीडिया से अपील की कि यदि कहीं वास्तविक खामियां हों, तो उन्हें सीधे विभाग के संज्ञान में लाया जाए, ताकि जांच कर आवश्यक सुधार और कार्रवाई की जा सके। बिना जांच के किसी डॉक्टर या पूरे विभाग को मीडिया ट्रायल के माध्यम से बदनाम करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इस बात की पड़ताल की जा रही है कि कहीं कुछ राजनीतिक या वैचारिक ताकतें संगठित रूप से सरकार और स्वास्थ्य विभाग की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास तो नहीं कर रही हैं। मंत्री ने भरोसा दिलाया कि सरकार पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रही है और सच्चाई जल्द सामने लाई जाएगी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ के माध्यम से भी इस मामले का संज्ञान लेते हुए अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

अस्पताल प्रशासन से कई बार गुहार लगाई, घंटों इंतजार किया, लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली : जानकारी के अनुसार, पश्चिमी सिंहभूम जिले के नोवामुंडी प्रखंड स्थित बालजोड़ी गांव निवासी डिंबा चतोम्बा अपने चार वर्षीय बेटे के इलाज की उम्मीद लेकर करीब 70 किलोमीटर दूर चाईबासा सदर अस्पताल पहुंचे थे। यहां बुधवार को बच्चे को भर्ती किया गया था। इलाज के दौरान शुक्रवार की शाम मासूम ने दम तोड़ दिया। बेटे की मौत से पहले ही टूट चुके पिता पर उस वक्त दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, जब शव को घर ले जाने के लिए अस्पताल में कोई एंबुलेंस उपलब्ध नहीं कराई गई। बताया जा रहा है कि डिंबा चतोम्बा ने अस्पताल प्रशासन से कई बार गुहार लगाई, घंटों इंतजार किया, लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिली। आर्थिक रूप से बेहद कमजोर डिंबा के पास निजी वाहन कराने के पैसे नहीं थे। जेब में महज सौ रुपये थे। उसी से उन्होंने बीस रुपये की एक प्लास्टिक थैली खरीदी, बेटे का शव उसमें रखा और बचे पैसों से बस का किराया चुकाया। चाईबासा से नोवामुंडी तक बस में सफर करने के बाद वह पैदल चलते हुए शुक्रवार की देर रात अपने गांव बालजोड़ी पहुंचे।

क्या गरीबी इंसान से मरने के बाद भी सम्मान छीन लेती है : बस में मौजूद यात्रियों के मुताबिक, पूरी यात्रा के दौरान डिंबा चतोम्बा खामोश रहे। आंखों में आंसू थे, लेकिन बोलने की ताकत नहीं। गोद में थैले में रखा मासूम का शव और सामने सूनी सड़क—यह मंजर लोगों के दिलों को झकझोर गया। राज्य में यह नारा सुनने को मिलता है कि “हेमंत है तो हिम्मत है”, लेकिन इस घटना ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या गरीब और आदिवासी परिवारों के लिए सम्मानजनक अंतिम यात्रा भी अब एक सपना बनती जा रही है। नोवामुंडी प्रखंड के बालजोड़ी गांव के इस पिता की पीड़ा अब पूरे सिस्टम पर सवाल बनकर खड़ी है। क्या सरकारी अस्पतालों में एंबुलेंस और शव वाहन सिर्फ कागजों में मौजूद हैं। क्या गरीबी इंसान से मरने के बाद भी सम्मान छीन लेती है। यह घटना न केवल प्रशासन के लिए चेतावनी है, बल्कि पूरे तंत्र को आत्ममंथन करने पर मजबूर करती है।

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