फिल्म समीक्षा : सिनेमा के पार जाकर दिल में बस जाती है आशीष मॉल की फिल्म ‘शतक’

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Eksandeshlive Desk

नई दिल्ली : डायरेक्टर आशीष मॉल की फिल्म ‘शतक’ पारंपरिक कमर्शियल सिनेमा से अलग एक गंभीर और विचारशील विषय को उठाती है। यह फिल्म सिर्फ घटनाओं का सिलसिला नहीं दिखाती, बल्कि एक विचारधारा की यात्रा को समझने और महसूस करने का अवसर देती है। फिल्म राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लगभग एक सदी लंबे सफर को परदे पर लाती है। शुरुआत छोटे स्तर से होती है और धीरे-धीरे यह एक बड़े संगठन के रूप में विकसित होता दिखता है। फिल्म इस सफर को सीधी और सरल भाषा में पेश करती है, जिससे दर्शक बिना उलझे कहानी से जुड़ा रहता है। केशव बलीराम हेडगेवार को एक आम इंसान के रूप में दिखाया गया है, जिनकी सोच असाधारण थी। वहीं माधव सदाशिव गोलवलकर के दौर में कहानी का टोन बदलता है और संघर्ष ज्यादा स्पष्ट हो जाता है। खासकर महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंधों वाला हिस्सा फिल्म को भावनात्मक और गंभीर बना देता है।

निर्देशन : आशीष मॉल का निर्देशन संतुलित है। उन्होंने फिल्म को ओवरड्रामैटिक बनाने से बचाया है और कहानी को सहज तरीके से आगे बढ़ाया है। लाइव-एक्शन और विजुअल इफेक्ट्स का संयोजन कई दृश्यों को प्रभावशाली बनाता है, हालांकि कुछ जगहों पर गति थोड़ी धीमी महसूस होती है। नितिन सावंत, रोहित गहलोत और उत्सव दान की लेखनी फिल्म को बोझिल नहीं होने देती। वहीं अनिल धनपत अग्रवाल का कॉन्सेप्ट साफ तौर पर नजर आता है, एक विचार को सिर्फ बताना नहीं, बल्कि दर्शक तक पहुंचाना। फिल्म कई जगह भावनात्मक जुड़ाव पैदा करती है, खासकर उन दृश्यों में जहां युवा अपने घर छोड़कर एक बड़े उद्देश्य की ओर बढ़ते हैं। कृधान मीडियाटेक के बैनर तले बनी इस फिल्म की प्रोडक्शन क्वालिटी मजबूत है। वीर कपूर का सपोर्ट फिल्म के स्केल में साफ दिखता है। बैकग्राउंड स्कोर कहानी के मूड को सपोर्ट करता है, लेकिन म्यूजिक फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष नहीं बन पाता। ‘शतक’ एक अलग तरह का सिनेमाई अनुभव है, जो आपको सोचने पर मजबूर करता है। यह फिल्म किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दी नहीं करती, बल्कि दर्शक को पूरा सफर दिखाती है। अगर आप इतिहास, विचारधारा और सामाजिक बदलाव को समझने में रुचि रखते हैं, तो यह फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए।

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