इबादत का शिखर है ‘एतेकाफ’,मुल्क में अमन-चैन के लिए उठे हजारों हाथ

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News by Mustaffa

अदा की गई तीसरे जुम्मे की नमाज: मौलाना आफताब मजाहिरी ने बताया एतेकाफ का महत्व

मेसरा (रांची): माहे रमजान के मुकद्दस महीने का कारवां अब अपने आखिरी पड़ाव की ओर बढ़ चला है। शुक्रवार को बीआईटी मेसरा ओपी थाना क्षेत्र स्थित जामा मस्जिद केदल सहित आसपास के गांवों-चुट्दू,नेवरी,फूरहूरा टोली और मेसरा गांव की मस्जिदों में रमजान के तीसरे जुम्मे की नमाज अकीदत और एहतराम के साथ अदा की गई। इस दौरान खुदा की बारगाह में सिर झुकाए हजारों रोजेदारों ने अपने गुनाहों की माफी मांगी और वतन की खुशहाली के लिए दुआएं कीं। दुनियादारी छोड़ खुदा से लौ लगाने का नाम है एतेकाफ,जामा मस्जिद केदल के इमाम मौलाना आफताब मजाहिरी ने जुम्मे के खुतबे (प्रवचन) में रमजान के दूसरे अशरे (मग्फिरत) और आखिरी दस दिनों की अहमियत पर विस्तार से रौशनी डाली। उन्होंने विशेष रूप से ‘एतेकाफ’ की फजीलत बताते हुए कहा कि यह इबादत का वह ऊंचा मुकाम है,जहाँ बंदा दुनिया की तमाम मशरूफियतों को त्याग कर खुद को मस्जिद के एक कोने में अल्लाह की इबादत के लिए समर्पित कर देता है। मौलाना आफताब मजाहिरी ने बताया कि,एतेकाफ न केवल रूह को पाकीजगी देता है,बल्कि यह शब-ए-कद्र जैसी मुकद्दस रात को तलाशने का सबसे बेहतरीन जरिया है। जो शख्स मस्जिद में वक्त गुजारता है,वह गुनाहों से महफूज रहता है। नमाज के बाद मस्जिदों में विशेष दुआओं का दौर चला। इमाम साहब ने मुल्क की हिफाजत,आपसी भाईचारे,अमन-शांति और तरक्की के लिए सामूहिक दुआ कराई। मार्च की चढ़ती गर्मी के बावजूद रोजेदारों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। नमाज के बाद लोगों ने एक-दूसरे से गले मिलकर जुम्मे की मुबारकबाद दी।

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