Eksandeshlive Desk
रांची : झारखंड के कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट्स को फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (एफजीडी) तकनीक से छूट दिए जाने से राज्य में प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ने की आशंका बढ़ गयी है। जुलाई 2025 में जारी केंद्र सरकार की अधिसूचना के अनुसार, राज्य की सभी 13 थर्मल यूनिट्स ‘कैटेगरी सी’ में हैं, जिन्हें अब सल्फर डाइऑक्साइड, पीएम2.5 और पारे जैसे खतरनाक गैसों के नियंत्रण के लिए एफजीडी लगाने की अनिवार्यता से छूट मिल गई है।
बता दें कि एफजीडी तकनीक न केवल वायु प्रदूषण घटाने में मददगार है, बल्कि इससे सीमेंट उद्योग में उपयोगी सिंथेटिक जिप्सम भी तैयार होता है। बावजूद इसके, झारखंड में राज्य सरकार के अधीन किसी भी पावर प्लांट में यह तकनीक अब तक नहीं लगाई गई है। केंद्र सरकार के स्वामित्व वाले सिर्फ दो प्लांट्स ने ही एफजीडी सिस्टम स्थापित किया है। आईआईटी के अध्ययनों में पाया गया है कि रांची, जमशेदपुर और धनबाद जैसे शहरों में पीएम2.5 प्रदूषण का 4 से 24 प्रतिशत हिस्सा पावर सेक्टर से आता है। ये शहर पहले से ही राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत आते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि छूट के चलते इन शहरों में प्रदूषण कम करने का 40% लक्ष्य हासिल करना और मुश्किल हो जाएगा।
एक अनुमान के मुताबिक, 2018 में झारखंड में थर्मल पावर प्लांट्स से हर साल करीब 2,200 लोगों की असमय मृत्यु हुई। साथ ही ये संयंत्र पारे के भी बड़े औद्योगिक उत्सर्जक हैं। एफजीडी तकनीक इससे 30 से 40% तक नियंत्रण में सक्षम मानी जाती है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (क्रेया) के विश्लेषक मनोज कुमार ने कहा कि यह फैसला न केवल पर्यावरणीय लक्ष्यों को पीछे धकेलेगा, बल्कि उद्योगों के सतत विकास और आमजन के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकता है।
