Deepak Mishra
लातेहार: झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और पूर्वी उत्तरप्रदेश समेत पूरे पूर्वी भारत में करमा पर्व एकता, भाई-बहन के अटूट रिश्ते और प्रकृति की पूजा का प्रतीक है। आदिवासी समाज में इसका विशेष महत्व होता है यह पर्व भाद्रपद महीने की एकादशी को मनाया जाता है और मुख्य रूप से युवा लड़कियां व महिलाएं इसमें उत्साहपूर्वक भाग लेती हैं। इस वर्ष 3 सितंबर 2024 को करमा पर्व मनाया जा रहा है।
करमा पर्व में करम देवता की पूजा किया जात है, जिन्हें धरती की उर्वरता , भाई-बहन के संबंध और समृद्धि का देवता माना जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के लंबी उम्र और खुशहाली के लिये व्रत रखती हैं।
ऐसी मान्यता है कि एक बार करम देव देवताओं से नाराज होकर धरती पर आ गये तो अकाल पड़ गया था। जब लोगों ने उनकी विधिवत पूजा अर्चना की तो उन्होंने फिर से धरती को उपजाऊ बना दिया था। तभी से यह परंपरा शुरू हुई और हर साल इसे मनाया जाता है।
करमा पर्व की रात गांव चौपालों में गीत-संगीत और नृत्य का रंग चढ़ जाता है। ढोल , मांदर और नगाड़ों की थाप पर युवा-युवतियां गोल घेरे में नृत्य करते हैं करमा गीतों में लोकधुन और सामूहिकता की शक्ति दिखाई पड़ता है।
आज के समय में भी करमा पर्व सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक माना जाता है। साथ ही यह पर्व हमें पर्यावरण के संरक्षणों का संदेश भी देता है, क्योंकि इसमें करम वृक्ष की पूजा और प्रकृति से जुड़ाव को काफी महत्व दिया जाता है।यह पर्व भाई-बहन के रिश्ते की मजबूती, प्रकृति के प्रति आभार और सामुदायिक एकता का बेहद ही सुन्दर संगम माना जाता है।
