Eksandeshlive Desk
रांची (ओरमांझी) : कहते हैं कि पैसा और प्यार अच्छे-अच्छों का रिश्ता बिगाड़ देते हैं, लेकिन कभी-कभी इंसाफ का रास्ता थाने की दहलीज के बजाय गांव की पंचायत में ही खत्म हो जाता है। ओरमांझी में फर्नीचर की उधारी को लेकर हुआ खूनी खेल आखिरकार समझौते की मेज पर जाकर शांत हुआ।
जब सागवान की कीमत खून से चुकानी चाही : मजहरुल हक की दुकान से 1,50,000 रुपये का फर्नीचर लेकर यूसुफ अंसारी मानो गायब ही हो गए थे। जब मजहरुल ने अपना हक मांगा, तो यूसुफ का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। बात इतनी बढ़ी कि जुबान की जगह चाकू चलने लगा। मजहरुल लहूलुहान हुए, शोर मचा और मामला थाने की चौखट तक पहुंच गया।
थाने की दहलीज पर पलटा पासा : जैसे ही पुलिस ने आरोपी यूसुफ की तलाश शुरू की और कानूनी शिकंजा कसने लगा, वैसे ही सुलह के दूत सक्रिय हो गए। शायद यूसुफ को गलती का अहसास हुआ या फिर मजहरुल के दिल में पुराना भाईचारा जाग उठा। पुलिस के पास लिखित शिकायत पहुंचने के बावजूद, दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से मामले को रफा-दफा करना बेहतर समझा।
न केस हुआ, न कचहरी : दोनों पक्षों के बीच सुलह हो गई और अब कोई कानूनी मामला दर्ज नहीं किया गया है।अगली बार उधारी मांगें तो ढाल लेकर जाएं, लेकिन समझौता करना हो तो बड़ा दिल लेकर आएं! पुलिस की फाइलों में तो अब यह मामला ठंडे बस्ते में है, लेकिन ओरमांझी के बाजारों में इस चाकू वाली उधारी और चाय वाले समझौते के चर्चे अब भी गर्म हैं।
