पर्यावरणीय न्याय केवल एक नीतिगत मुद्दा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अनिवार्यता है: बी. वी. नागरत्ना

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News & Eddit by Sunil Verma

रांची: पर्यावरणीय न्याय केवल एक नीतिगत मुद्दा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अनिवार्यता है। न्यायालयों को संवैधानिक सिद्धांतों की व्याख्या के माध्यम से पर्यावरणीय शासन को दिशा देने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उक्त बातें बतौर मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना कांके स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी आॅफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ में आयोजित चौथा जस्टिस एसबी सिन्हा मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए कही। भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र के विकास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सतत विकास, प्रदूषक भुगतान सिद्धांत, सावधानी सिद्धांत, पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत तथा अंतर-पीढ़ी समानता जैसे प्रमुख सिद्धांतों की विचार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय मामलों में न्यायालयों को भविष्य उन्मुख, सावधानीपूर्ण और संदर्भ-संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी कहा कि पर्यावरणीय न्याय सामाजिक न्याय से गहराई से जुड़ा हुआ है, क्योंकि पर्यावरणीय क्षति का सबसे अधिक प्रभाव गरीब और वंचित वर्गों पर पड़ता है। उन्होंने पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जनसहभागिता को पर्यावरणीय निर्णय-प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। मौके पर विशिष्ट अतिथि के रूप में न्यायमूर्ति एम. एस. सोनक, मुख्य न्यायाधीश, झारखंड उच्च न्यायालय एवं कुलाधिपति, एनयूएसआरएल ने अपने संबोधन में कहा कि मानव के बनाए कानूनों में अपील की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन प्रकृति के कानूनों में केवल परिणाम होते हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के खतरों—जैसे ग्लेशियर का पिघलना, समुद्र स्तर में वृद्धि, ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी और खाद्य असुरक्षा की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि मानवता इन चेतावनियों को नजरअंदाज नहीं कर सकती। उन्होंने महात्मा गांधी के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन किसी के लालच को नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि एनयूएसआरएल जैसे संस्थानों की भूमिका वर्तमान पर्यावरणीय अस्थिरता के दौर में अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो शोध, शिक्षा और नीति निर्माण के माध्यम से समाज को दिशा प्रदान कर सकते हैं। मौके पर न्यायमूर्ति एस. एन. प्रसाद, न्यायमूर्ति आनंद सेन, न्यायमूर्ति रोंगोन मुखोपाध्याय, न्यायमूर्ति दीपक रोशन, न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अंबुज नाथ तथा सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी सहित अन्य गणमान्य अतिथि शामिल थे। यह व्याख्यान स्वर्गीय न्यायमूर्ति एस.बी सिन्हा, पूर्व न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय, की स्मृति में आयोजित किया गया। न्यायमूर्ति सिन्हा अपने उत्कृष्ट न्यायिक दृष्टिकोण, गहन विद्वता और स्वतंत्र विचारों के लिए जाने जाते थे। उनका योगदान भारतीय न्यायपालिका और संवैधानिक कानून के क्षेत्र में सदैव स्मरणीय रहेगा। कार्यक्रम का समापन इंदरजीत सिन्हा, अधिवक्ता, झारखंड उच्च न्यायालय, रांची एवं स्वर्गीय न्यायमूर्ति एस. बी. सिन्हा के सुपुत्र द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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