खूंटी का झोंगो पाहन एशियन गेम्स में गोल्ड और रजत पदक जीत कर देश का नाम रोशन कर लौटा
Mohammad Saeed
रांची : खूंटी के सुदूर सिल्दा गांव का नाम अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेल मानचित्र पर सुनहरे अक्षरों में लिखा जाने लगा है- इसकी वजह हैं 17 वर्षीय तीरंदाज झोंगो पाहन। एशियन यूथ पैरा गेम्स 2025 में उन्होंने भारत के लिए स्वर्ण और रजत पदक जीतकर अपने गांव, परिवार और कोचों का मान बढ़ाया है। झोंगो का जन्म पैरापैरेसिस की चुनौतियों के साथ हुआ था, जिससे वह चल-फिर नहीं पाते थे उन्होंने पैरों पर खड़ा होना नहीं सीखा, बल्कि जीवन की कठिनाइयों के सामने कभी झुकने नहीं दिया। सामाजिक भेदभाव और अपनी शारीरिक सीमाओं के चलते लोगों से दूर रहते थे। उनका परिवार बेहद साधारण है। पिता गुसु झोंगो एक पशु चराने वाले हैं, जो अनुशासन और परिश्रम की वास्तविक मिसाल हैं। परिवार में चार भाई-बहन हैं, जिनमें बड़े भाई बाजी झोंगो ने आर्थिक मजबूरियों की वजह से स्कूल छोड़कर मजदूरी का काम शुरू कर दिया था। मां स्वाग देवी की मेहनत और त्याग घर की रोज-मर्रा की समस्याओं को सहकर परिवार का संतुलन बनाए रखती है। बारिश के मौसम में घर की छत से पानी टपकता रहता है और संसाधनों की कमी जीवन की कठिनाइयों को और बढ़ा देती है।
हर कठिनाई को सीढ़ी की तरह उपयोग किया : झोंगो की ज़िंदगी में मोड़ तब आया जब उसके स्कूल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस आवासीय विद्यालय, खूंटी के आशीष कुमार और दानिश अंसारी ने उसकी प्रतिभा को पहचाना। यह विद्यालय उन बच्चों को मुफ्त शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण देता है जो किसी न किसी विपरीत परिस्थिति से जूझ रहे हैं — चाहे वो अनाथ हों, मानव तस्करी के शिकार रहे हों, नक्सल प्रभावित इलाकों के हों या फिर differently abled हों। शुरू-शुरू में झोंगो ने बांस का धनुष और सस्ते उपकरणों के साथ अभ्यास शुरू किया था, परंतु उसकी क्षमता और लगन ने सबको चकित कर दिया। कोच दानिश ने उसके लिए एक मानक रीकर्व धनुष भी उपलब्ध कराया, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए अनिवार्य होता है। कुछ ही समय में उसने राष्ट्रीय कार्यों में भाग लिया और जैपुर में 6वीं नेशनल पैरा-आर्चरी चैंपियनशिप में रजत पदक जीता, जिससे उस पर और भी उम्मीदें जगीं। 2025 के आख़िर में दुबई में हुए एशियन यूथ पैरा गेम्स में झोंगो ने भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व की। यहां उसने मिक्स्ड टीम इवेंट में स्वर्ण पदक और इंडिविजुअल स्पर्धा में रजत पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया। सेमीफाइनल में मलेशिया के बिन मोहम्मद फौजी को हराने के बाद, झोंगो ने फाइनल मुकाबले में चीनी शीर्ष खिलाड़ी के खिलाफ कठिन संघर्ष किया, लेकिन अपनी हिम्मत और कौशल से दर्शकों का दिल जीत लिया। झोंगो के सफर की खास बात यह है कि उसने हर कठिनाई को सीढ़ी की तरह उपयोग किया। उसने न सिर्फ तीरंदाजी सीखी, बल्कि अपने गांव के अन्य बच्चों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गया है। दुबई में वह पहली बार ट्रेन से गया, पहली बार घर से बाहर इतने बड़े प्रतियोगिता में भाग लिया, और अनुभव से भरपूर लौटा। आज झोंगो न केवल एक मेडलिस्ट है, बल्कि विलक्षण साहस, आत्म-विश्वास और संघर्ष की प्रतीक भी है। उसके लिए तीरंदाजी सिर्फ खेल नहीं, बल्कि उसकी पहचान और अपने परिवार व समाज को गर्वित करने का माध्यम बन गई है।
