संपादकीय : जीवन को आश्रय देने वाली धरती का बढ़ता तापमान वैश्विक चुनौती

Editorial

Alok ranjan jha Dinkar

रांची : धरती का लगातार बढ़ता तापमान निस्संदेह सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती बन गया है। भारत सहित संपूर्ण विश्व में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरे बढ़ते जा रहे हैं। चिंता की बात है कि इसको लेकर भारत को छोड़कर दुनिया की अधिकांश सरकारें बेपरवाह दिखाई दे रही हैं। विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की रिपोर्ट बेहद डरावनी और सावधान करने वाली है, जो बताती है कि 2024 में पृथ्वी का तापमान पहली बार औद्योगिक काल से पहले (1850-1900) की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की ”लक्ष्मण रेखा” को भी पार कर गया। इस दौरान धरती की सतह औसत से 1.55 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रही। इसकी मुख्य वजह ग्रीन हाउस गैसों का तेजी से बढ़ना और मौसमी घटना ला नीना (ठंडी समुद्री सतह) का अल नीनो (गर्म समुद्री सतह) में बदलना रहा। रिपोर्ट के अनुसार, तापमान बढ़ने से चरम मौसमी आपदाएं जैसे-सूखा, तूफान और बाढ़ जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। जाहिर है इसका असर भोजन के संकट के रूप में सामने आ रहा है।

तापमान बढ़ने से पृथ्वी की पारिस्थितिकी तंत्र में भी अनेक आमूलचूल परिवर्तन देखे जा रहे हैं। मैदान से पहाड़ तक बढ़ती तपिश और उमस को झेलना मुश्किल होता जा रहा है। इससे कहीं पर बाढ़, तो कहीं पर सूखे का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति किस कदर साल-दर-साल बद से बदतर होती जा रही है इसका अंदाजा रिपोर्ट में किए गए इसे दावे से लगाया जा सकता है, जिसके अनुसार, दिसंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच दुनिया के हर पांच में से एक व्यक्ति ने अत्यधिक गर्मी झेली है। कुल मिलाकर दुनियाभर के 39.40 करोड़ लोगों ने 30 दिन या इससे अधिक दिन अत्यधिक गर्मी झेली। वहीं भारत एशिया में तेजी से बढ़ते औसत तापमान वाले 10 देशों में पांचवें स्थान पर है। दिसंबर 2024 से फरवरी 2025 तक देशभर के 35.80 करोड़ लोगों ने प्रतिदिन सामान्य से ज्यादा गर्मी का सामना किया है। यह नहीं है कि गर्मी मैदानी और पहाड़ी इलाकों में ही बढ़ रही है, बल्कि इस मामले में महासागर भी नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। परिणामस्वरूप वातावरण में ग्रीनहाउस गैस तेजी से बढ़ रहा है। आंकड़े बताते हैं कि 1960 से 2005 की अवधि की तुलना में समुद्र दोगुनी गति से गर्म हो रहे हैं। इससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिसके कारण समुद्र का जलस्तर दोगुना हो गया है।

वैसे तो विश्व मौसम संगठन की ताजा रिपोर्ट में ऐसी कोई नई बात नहीं है, जिसके बारे में दुनिया को पहले से अंदाजा न हो। यह रिपोर्ट हमें उस खतरे के बारे में सचेत कर रही है जिसके बारे में हम जानकर भी बेपरवाह बने हुए हैं। यह सच है कि ग्रीनहाउस गैस और जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना सामूहिक प्रयास से ही किया जा सकता है, लेकिन इसमें विकसित देशों को बड़ी भूमिका निभाने की जरूरत है, जिससे वे पीछे हट रहे हैं। अधिकतम कार्बन का उत्सर्जन करने वाले ऐसे देश विकासशील देशों की आड़ लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जलवायु परिवर्तन के खतरे को खारिज कर साल 2015 के उस पेरिस समझौते से अपने देश को अलग कर रहे हैं, जिसमें वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे कम तक सीमित करने का संकल्प लिया गया था। हालांकि भारत सरकार ने जरूर इस पर गंभीरता दिखाई है। इसी तरह अन्य देश भी गंभीर प्रयास करें, तो ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता जिससे हालात में सुधार न हो। जरूरत है पर्यावरण के साथ तालमेल और सामंजस्य स्थापित कर आगे बढ़ने की ताकि धरती जीवन को आश्रय देने वाली बनी रहे।

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