Alok ranjan jha Dinkar
Ranchi : क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दो अप्रैल के ‘मुक्ति दिवस’ से अमेरिका और शेष दुनिया के बीच ‘व्यापार युद्ध’ तेज होने जा रहा है? ट्रंप इस दिन से कार और कार के नए पार्ट्स पर नए टैरिफ लगाने जा रहे हैं। अमेरिकी प्रेसिडेंट ने कहा है कि वे उन अलग-अलग ट्रेडिंग पार्टनर्स पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाएंगे जिनकी प्रैक्टिस को वे सही मानते हैं। ट्रंप पहले ही स्टील और एलुमिनियम के आयात पर टैरिफ लगा चुके हैं। उन्होंने कनाडा, चीन और मैक्सिको से आयात किए जाने वाले सामान पर भी टैरिफ लगाए हैं। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि एशिया, यूरोप और दक्षिण अमेरिका के उन देशों पर ट्रंप टैरिफ लगाएंगे जो अमेरिका के साथ निर्यात ज्यादा करते हैं और आयात कम। इसके साथ ही सभी की निगाहें ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर लगाए जाने वाले टैरिफ पर भी लगी हैं। माना जा रहा है कि हाल में बाजार में जो गिरावट आई है उसका एक कारण अमेरिकी टैरिफ का डर भी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिकी टैरिफ रूपी ‘कोहरे’ से भारत का ‘सूरज’ निकलेगा? या घरेलू शेयर बाजार में बिकवाली का एक और देखने को मिलेगा।
ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित पारस्परिक टैरिफ का अलग-अलग लोगों द्वारा भले ही अलग-अलग अर्थ लगाया जा रहा हो, लेकिन कुछ जानकारों का मानना है कि भारत, थाईलैंड और ब्राजील पांच सबसे अधिक जोखिम वाले देशों में शामिल हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर भारत के लिए ट्रंप की घोषणाएं बहुत कठोर होती हैं तो भारतीय कंपनियों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही घरेलू शेयर बाजार में बिकवाली का एक और दौर शुरू हो सकता है। एफपीआई प्रवाह का रुझान भी मुख्य रूप से इसी पर निर्भर करेगा। वैसे पहले से ही कमजोर भारतीय आर्थिक आंकड़े, खराब कापोर्रेट आय और एफपीआई द्वारा चीन में अधिक आकर्षक मूल्यांकन और अमेरिका में आकर्षक अवसर पाना घरेलू शेयर बाजार के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है। हालांकि दूसरी छमाही में एफपीआई की खरीदारी के कारण भारत में एफपीआई का बहिर्वाह मार्च में घटकर 3,973 करोड़ रुपये रह गया, जबकि फरवरी में यह 34,574 करोड़ रुपये और जनवरी में 78,027 करोड़ रुपये था। बहरहाल अमेरिकी ‘मुक्ति दिवस’ को अपेक्षित टैरिफ के लक्ष्य, आकार और दायरे को लेकर भारी अनिश्चितता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिकी टैरिफ के ‘प्रहार’ से भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और बाजार है, कैसे निपटता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत समेत दुनिया भर में ‘व्यापार युद्ध’ के तेज होने की चिंता है, जिसका असर बाजारों पर पड़ रहा है। यह नहीं है कि अमेरिकी टैरिफ की मार कुछ चुनिंदा देशों पर ही पड़ेगी। ट्रंप ने उन अटकलों को खारिज कर दिया है कि 2 अप्रैल को टैरिफ की घोषणाएं होने पर वह शुरुआत में इसके दायरे को कम देशों तक सीमित कर सकते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ट्रंप ने अमेरिका पर आयात शुल्क बढ़ाने के लिए भारत को बार-बार निशाने पर लिया है। उन्होंने कई मौकों पर भारत को वैश्विक ‘टैरिफ किंग’ कहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अभी अमेरिका से आयात पर भारत की औसत टैरिफ दर 17 प्रतिशत है, जो अमेरिका के औसत 3.3 प्रतिशत से काफी अधिक है। रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने हाल ही में चेतावनी दी है कि ट्रंप के संभावित उच्च टैरिफ भारत सहित एशिया-प्रशांत क्षेत्र की कुछ अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। अमेरिका भारत के शीर्ष निर्यात गंतव्यों में से एक है और नए टैरिफ से कई बड़ी कंपनियों के राजस्व प्रवाह पर असर पड़ सकता है। जैसे कि इस्पात, एलुमनीनियम, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि भारत सरकार अमेरिकी आयात के एक महत्वपूर्ण हिस्से पर टैरिफ कम करने पर विचार कर रही है ताकि भारत के निर्यात पर ट्रंप के टैरिफ को प्रभाव को कम किया जा सके।