सावरकर के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव पर ही आगे बढ़ रहा देश

NATIONAL

Eksandeshlive Desk

रांची/नई दिल्ली : वीर सावरकर के आदर्शों पर चलने वाले नए भारत के निर्माता शाह की छवि उस समय और स्पष्ट हो जाती है, जब कोई आम भारतीय अंडमान एवं निकोबार की तपोभूमि में खड़ा होकर इतिहास के पन्नों को वर्तमान से जुड़ते देखता है। श्री विजयपुरम में वीर सावरकर की कविता ‘सागरा प्राण तळमळला’ के 115 वर्ष पूरे होने का अवसर केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह उस चेतना का उत्सव था, जिसने भारत को गुलामी से आज़ादी की ओर अग्रसर किया। आम आदमी की नज़र से देखें तो यह वही भूमि है, जहां यातना, त्याग और राष्ट्रभक्ति ने मिलकर भारत की आत्मा को गढ़ा।

अंत्योदय की राजनीति करने वाले शाह के नेतृत्व की विशेषता यही है कि वे इतिहास को केवल स्मृति नहीं, प्रेरणा बनाकर प्रस्तुत करते हैं। अंडमान एवं निकोबार अब सिर्फ द्वीप समूह नहीं, बल्कि असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों के तप, त्याग और अखंड राष्ट्रभक्ति की जीवंत तपोभूमि बन चुकी है। यहीं वीर सावरकर ने जीवन के सबसे कठिन क्षण बिताए, यहीं सुभाष बाबू का स्वप्न आकार लेता दिखाई देता है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन द्वीपों को ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ नाम दिया, तो यह केवल नामकरण नहीं था, बल्कि आज़ाद हिंद फौज और सुभाष बाबू के सपनों को धरातल पर उतारने का साहसिक निर्णय था। भारत की राजनीति को नई वैचारिक पहचान देने वाले शाह के दृष्टिकोण में सावरकर केवल अतीत के नायक नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के पथप्रदर्शक हैं। वीर सावरकर की आदमकद प्रतिमा का अनावरण उस विचारधारा का प्रतीक बन गया, जिसने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव रखी।

Spread the love