राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से मिले पूर्व सांसद, सौंपा ज्ञापन
Eksandeshlive Desk
रांची : अखिल भारतीय संपूर्ण क्रांति राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद, पूर्व जैक उपाध्यक्ष और झारखंड मजदूर मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. सूरज मंडल ने कहा है कि झारखंड गठन के बाद पिछले 25 साल से शिक्षा के साथ ही हर क्षेत्र में झारखंड की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है और इस मामले में हेमंत सरकार ने भी झारखंड में सम्पूर्ण शिक्षा विशेषकर उच्च शिक्षा की स्थिति को अत्यंत निराशाजनक स्थिति में पहुंचा दिया है। डाॅ. मंडल ने कहा कि कम-से-कम उच्च शिक्षा की स्थिति को सुधारने और झारखंड के युवाओं, छात्र-छात्राओं और सभी लोगों को सीधा लाभ पहुंचाने के लिये राज्य सरकार, राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार के अनुभव का लाभ उठा सकती थी लेकिन उसमें भी वह पूरी तरीके से असफल रही। डॉ. मंडल ने राजधानी रांची में लोकभवन में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से भेंट कर उन्हें इस संदर्भ में एक ज्ञापन सौंपा। गंगवार से यह अपील की कि उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिये वे अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए राज्य सरकार को इससे संबंधित सख्त कदम उठाने का निर्देश दें। साथ ही सभी विश्वविद्यालयों में प़्रति कुलपति की नियुक्ति अविलम्ब की जानी चाहिये।
डाॅ. मंडल ने कहा कि विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं उच्च तकनीकी शिक्षा की दयनीय स्थिति के साथ ही हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार के बढ़ने का खामियाजा झारखंड के आम लोगों को ही उठाना पड़ रहा है। डाॅ. मंडल ने कहा कि उच्च शिक्षा के मामले में बाहरी-भीतरी का राग अलापकर अनेक स्वार्थी नेता अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं। इसी का परिणाम है कि उच्च शिक्षा के मामले में उठाये गये किसी भी सकारात्मक कदम को वैसी बातों से जोड़ दिया जाता है जो घातक है जबकि वास्तविकता यह है कि विधानसभा तक में ऐसी बातें करने वाले पूर्व शिक्षा मंत्री और पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री के ऊपर भी नकारात्मकता एवं भ्रष्टाचार भरा रवैया अपनाने के साथ ही प्रखंड विकास पदाधिकारियों से राशि दोहन करने तक के अनेक गंभीर आरोप हैं। डाॅ. मंडल ने कहा कि वास्तविकता यही है झारखंड में अबतक अनुसूचित जनजाति के जिस भी मुख्यमंत्री या मंत्री ने कार्यभार संभाला है उसने केवल और केवल अपनी खास जाति-समाज की ही बात की और बाकी अनुसूचित जातियों, जनजातियों, ओबीसी आदि को कहीं पीछे छोड़ दिया। वरिष्ठ नेता ने कहा कि आम जनता को यह बात बतायी जानी चाहिये कि अबतक झारखंड में कितने आदिवासियों और मूल वासियों को मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक एवं अन्य शीर्ष पदों पर 25 साल में नियुक्त किया गया। डाॅ. मंडल ने कहा कि मुख्यमंत्री आवास में पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने एक पूर्व मुख्यमंत्री ने डेढ़-दो घंटे मुलाकात की जिसका एजेंडा साफ नहीं है और कुल मिलाकर झारखंड में यही स्थिति शुरुआत से कायम है जहां ऐसा लगता है कि आम जनमानस के हित में सत्ता और विपक्ष, दोनों की मंशा स्पष्ट नहीं है। उन्होंने कहा है झारखंड में पिछले 25 साल में से 20 साल सत्ता के शिखर पर आदिवासी का जबकि 5 साल एक बाहरी व्यक्ति का कब्जा रहा लेकिन उपलब्धियों के नाम पर सन्नाटा ही कहा जायेगा। एक कीर्तिमान अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण को 27 प्रतिशत से घटाकर 14 प्रतिशत कर दिया गया जबकि अनुसूचित जनजाति के आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया गया। इसके कारण पिछले 25 साल में ओबीसी श्रेणी के कम-से-कम 6 लाख पदों पर ओबीसी उम्मीदवारों की नियुक्ति नहीं हो सकी। वहीं दूसरी ओर 11 जिले में ओबीसी आरक्षण खत्म करने के बाद मुखिया से जिला परिषद अध्यक्ष तक 100 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित कर दिया गया और इसे झारखंड के हित में सही नहीं कहा जा सकता। ये सभी वैसे जिले हैं जिनमें से कहीं भी अनुसूचित जनजाति की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक नहीं है। यह स्पष्ट रूप से ओबीसी वर्ग की हकमारी है।
डॉ. मंडल ने कहा कि यह प्रवृति बेहद खतरनाक है क्योंकि बांग्लादेश में केवल दो प्रतिशत आरक्षण कम करने के कारण आंदोलन हुआ जिसके कारण वहां की सरकार को हटना पड़ा। डॉ. मंडल ने कहा कि सरकार के हर विभाग में केवल और केवल भ्रष्टाचार का बोलबाला है। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि झारखंड अलग राज्य गठन के आंदोलनकारी के नाम पर चार सौ गैर आंदोलनकारियों को आंदोलनकारी का दर्जा दे दिया गया है जिन्होंने झारखंड की लड़ाई नहीं लड़ी। डाॅ. मंडल ने कहा कि झारखंड आंदोलनकारी बादल महतो के द्वारा तैयार की गयी उस सूची को उन्होंने राज्यपाल को समर्पित किया है और उन्हें आन्दोलनकारियों की सूची से निकालने के लिये राज्यपाल से उन्होंने अनुरोध किया है। पूर्व सांसद डॉ. मंडल ने कहा कि अगले 3 मई को झारखंड विधानसभा के पुराने भवन के सभा कक्ष में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय के नेताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया है जिसमें मुख्य रूप से ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत से घटाकर 14 प्रतिशत करने के कारण पिछले 25 साल में ओबीसी वर्ग को हुए नुकसान के बाद उत्पन्न स्थिति की समीक्षा करते हुए तीव्र आंदोलन की रणनीति तय की जायेगी।
