Eksandeshlive Desk
पाम बीच (फ्लोरिडा)/तेहरान : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी तनाव के बीच बड़ा बयान देते हुए कहा है कि दोनों देशों के बीच “कई अहम मुद्दों पर सहमति” बनी है और युद्ध खत्म करने के लिए उच्च स्तर पर बातचीत जारी है। हालांकि ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ किसी भी सार्थक वार्ता के दावे को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि मौजूदा हालात में ऐसी कोई बातचीत नहीं चल रही है। ईरान ने अमेरिकी प्रस्तावों और बयानों को भ्रामक बताते हुए कहा कि ऊर्जा संयंत्रों पर हमले को पांच दिन के लिए टालने की घोषणा महज रणनीतिक चाल है, जिसका उद्देश्य युद्ध के बीच समय हासिल करना और वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रभावित करना है।
ट्रंप ने कहा- युद्ध समाप्त होने के बाद भी वह पेंटागन के लिए 200 अरब डॉलर के अतिरिक्त फंड की मांग करेंगे : ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अमेरिका ईरान की सरकार के एक “शीर्ष व्यक्ति” के संपर्क में है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह व्यक्ति मोजतबा खामेनेई नहीं हैं, जिनका नाम हाल के दिनों में चर्चा में रहा है। ट्रंप के मुताबिक, दोनों देशों के बीच करीब 15 बिंदुओं पर सहमति बनी है। इनमें ईरान का परमाणु हथियार न रखने का वादा भी शामिल है। हालांकि, ईरान पहले भी सार्वजनिक रूप से इस तरह की बात कह चुका है और उसने अमेरिका के साथ किसी औपचारिक बातचीत से इनकार किया है। राष्ट्रपति ने ईरानी तेल पर संभावित प्रतिबंधों में ढील को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य ऊर्जा संकट के बीच सप्लाई को बनाए रखना है और इससे युद्ध की स्थिति पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि युद्ध समाप्त होने के बाद भी वह पेंटागन के लिए 200 अरब डॉलर के अतिरिक्त फंड की मांग करेंगे। उनका कहना था कि मजबूत रक्षा तैयारियां हमेशा जरूरी होती हैं। ट्रंप ने विश्वास जताया कि होर्मुज स्ट्रेट जल्द ही पूरी तरह खुल जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वह चाहते हैं कि इस अहम समुद्री मार्ग का संचालन अमेरिका और ईरान मिलकर करें। ट्रंप के इन बयानों के बाद पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर नई अटकलें शुरू हो गई हैं। उल्लेखनीय है कि अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को संयुक्त रूप से ईरान पर हमले शुरू किए थे, जिसमें सर्वोच्च नेता अली खामेनेई समेत कई बड़े नेता और अधिकारी मारे गए थे। वहीं ईरान मिलिटरी न्यूज की एक रिपोर्ट में ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा, “हम बातचीत जारी होने के ट्रंप के दावे को खारिज करते हैं और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान तब तक कोई बातचीत स्वीकार नहीं करेगा जब तक युद्ध में उसके मकसद पूरे नहीं हो जाते। ट्रंप की बातें उनकी पिछली धमकियों से पीछे हटना हैं, लेकिन ईरान का रुख नहीं बदला है। जहां तक होर्मुज स्ट्रेट की बात है, हम फिर से कहते हैं कि यह रास्ता हमलावरों के लिए बंद रहेगा।”
ट्रंप का मकसद ऊर्जा की कीमतें कम करना और सैन्य योजनाओं को लागू करने के लिए समय हासिल करना : ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मेहर ने ईरानी विदेश मंत्रालय के हवाले से कहा कि तेहरान और वॉशिंगटन के बीच कोई बातचीत नहीं हो रही है। ट्रंप की टिप्पणियों का मकसद ऊर्जा की कीमतें कम करना और अपनी सैन्य योजनाओं को लागू करने के लिए समय हासिल करना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तनाव कम करने के लिए क्षेत्रीय देशों की ओर से कुछ “पहल” की जा रही हैं, लेकिन उनकी चिंताओं को वॉशिंगटन के सामने उठाया जाना चाहिए, क्योंकि यह युद्ध उसी पक्ष ने शुरू किया है। ईरान ने यह भी कहा कि यह युद्ध उन पर और इस क्षेत्र पर थोपा गया है। युद्ध को समाप्त करना अमेरिका और इजराइल के हाथ में है। इससे पहले ट्रंप ने ऐलान किया था कि अमेरिका और इजरायल अगले 5 दिन तक ईरान के ऊर्जा सुविधाओं पर कोई हमला नहीं करेंगे। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसकी घोषणा करते हुए लिखा कि यह फैसला पिछले 2 दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच हुई अच्छी और सार्थक बातचीत के बाद लिया गया है। ट्रंप ने लिखा कि मध्य पूर्व में आपसी दुश्मनी को हमेशा खत्म करने के लिए गहरी, विस्तृत और रचनात्मक बातचीत हफ्तों तक जारी रहेगी। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, ”मुझे खुशी है कि पिछले दो दिनों में अमेरिका-ईरान के बीच हमारी आपसी दुश्मनी को हमेशा के लिए खत्म करने के संबंध में बहुत अच्छी-सार्थक बातचीत हुई। इन गहरी, विस्तृत और रचनात्मक बातचीत को देखते हुए मैंने युद्ध विभाग को निर्देश दिया कि वे ईरान के ऊर्जा संयंत्र और ऊर्जा ढांचे पर 5 दिनों के लिए सभी हमले टाल दें। यह फैसला चल रही बैठकों और चर्चाओं की सफलता पर निर्भर करेगा।” ट्रंप ने इससे पहले शनिवार को ईरान के ऊर्जा संयंत्रों पर हमला करने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर तेहरान इस समय से ठीक 48 घंटों के भीतर बिना किसी धमकी के होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह से नहीं खोलता है तो अमेरिका उनके विभिन्न ऊर्जा संयंत्रों पर हमला करके उन्हें नष्ट कर देगा, जिसकी शुरुआत सबसे बड़े संयंत्र से होगी।
