Eksandeshlive Desk
रांची : झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान शुक्रवार को ग्रामीण विकास विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा के समय राज्य में बाहरी लोगों को बसाए जाने का मामला जोरदार तरीके से उठा। भाजपा विधायक नीरा यादव ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की। सदन में चर्चा के दौरान नीरा यादव ने कहा कि झारखंड के कई क्षेत्रों में बाहर से लोगों को लाकर व्यवस्थित रूप से बसाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन लोगों के आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र भी बनवाए जा रहे हैं। उनके अनुसार विशेष समुदाय के माध्यम से यह कार्य कराया जा रहा है, जिससे राज्य की जनसंख्या संरचना और स्थानीय अधिकारों पर प्रभाव पड़ सकता है। विधायक ने कहा कि बाहर से आए लोग सप्ताह में एक दिन जंगलों की कटाई कर जमीन तैयार करते हैं और वहां स्थायी रूप से बस जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि राज्य में 50 से अधिक ऐसे गांव चिन्हित किए जा सकते हैं, जहां इस प्रकार लोगों को बसाया गया है। उन्होंने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि आदिवासी और मूलवासी परिवारों को भूमि पट्टा देने में उदासीनता बरती जा रही है, जबकि बाहरी लोगों को जमीन उपलब्ध कराई जा रही है। यह गंभीर विषय है और इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। नीरा यादव ने राज्य सरकार की वित्तीय कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई विभागों द्वारा स्वीकृत बजट राशि का समुचित उपयोग नहीं किया जा सका है और कई विभाग 50 प्रतिशत राशि भी खर्च नहीं कर पाए हैं। उपयोगिता प्रमाण पत्र समय पर केंद्र सरकार को नहीं भेजे जाने के कारण केंद्रीय अनुदान प्राप्त करने में भी बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं। इस पर विभागीय मंत्री योगेंद्र प्रसाद ने सदन को बताया कि पेयजल एवं स्वच्छता (पीएचईडी) विभाग में वर्ष 2024 तक लगभग 6260 करोड़ रुपये की राशि लंबित है। वहीं मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने स्पष्ट किया कि संबंधित मामलों को लेकर आवश्यक बैठक पहले ही आयोजित की जा चुकी है। विधायक ने राज्य में संचालित आवास योजनाओं की स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पांच लाख गरीब परिवारों के लिए प्रस्तावित आवास निर्माण की प्रगति स्पष्ट नहीं है। अबुआ आवास योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना में अनियमितताओं की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। कई लाभुकों को स्वीकृति मिलने के बावजूद समय पर किस्त नहीं मिलने से मकान अधूरे रह जाते हैं और जर्जर होकर गिरने की स्थिति में पहुंच जाते हैं। उन्होंने मांग की कि शिविरों में प्राप्त आवेदनों की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए तथा अंचल कार्यालयों में लंबित आवेदनों का शीघ्र निष्पादन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही गोड्डा जिले में कार्यपालक पदाधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की भी मांग सदन में उठाई।
जयराम महतो ने ग्रामीण-शहरी विकास की बढ़ती खाई पर जताई चिंता, योजनाओं में पारदर्शिता की मांग : झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान ग्रामीण विकास विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा में शुक्रवार को विधायक जयराम महतो ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच बढ़ती विकासात्मक असमानता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े पूर्व मंत्रियों आलमगीर आलम, एनोस एक्का और हरिनारायण राय का उल्लेख करते हुए कहा कि यह विभाग पहले भी विवादों में रहा है और कई मामलों में मंत्रियों को जेल तक जाना पड़ा है। ऐसे में वर्तमान मंत्री को विशेष सतर्कता, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ कार्य करने की आवश्यकता है। विधायक ने कहा कि शहरों की तुलना में अब गांवों में बिचौलियों की सक्रियता अधिक बढ़ गई है, जिसके कारण सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक सही तरीके से नहीं पहुंच पा रहा है। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि रिश्वत लेना अन्याय है और इसे किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। जयराम महतो ने सुझाव दिया कि प्रत्येक निर्माण स्थल पर शिलापट्ट के साथ क्यूआर कोड अनिवार्य रूप से लगाया जाए, ताकि आम नागरिक यह जान सकें कि कार्य किस एजेंसी द्वारा कराया गया, उस पर कितनी राशि खर्च हुई और गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी है। उन्होंने कहा कि इससे योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास के तहत सड़क और पुल निर्माण सबसे महत्वपूर्ण कार्य हैं, लेकिन इन परियोजनाओं में पारदर्शिता और निगरानी की कमी दिखाई दे रही है। विधायकों द्वारा लगातार मुद्दे उठाने के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है। महतो ने आरोप लगाया कि प्रखंड और अंचल स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है तथा रिश्वतखोरी आम समस्या बन चुकी है। उन्होंने निर्माण कार्यों में जनता की सीधी भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग करते हुए कहा कि यदि किसी परियोजना की गुणवत्ता पर स्थानीय लोगों को आपत्ति हो तो संबंधित ठेकेदार और अधिकारियों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की गति प्रभावित होगी। साथ ही विभागीय योजनाओं की नियमित निगरानी, सामाजिक अंकेक्षण तथा तकनीकी जांच को अनिवार्य बनाने की मांग की, ताकि योजनाओं का लाभ सीधे ग्रामीणों तक पहुंचे और भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।
नीरा यादव ने अबुआ आवास, डीएमएफटी फंड व वन भूमि मुद्दों पर सरकार को घेरा : झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के आठवें दिन शुक्रवार को सदन में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन, अबुआ आवास योजना, जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (डीएमएफटी) फंड तथा वन भूमि से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए। कोडरमा विधायक नीरा यादव ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में विकास कार्यों का प्रभाव धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है। उन्होंने कहा कि योजनाओं के समुचित क्रियान्वयन के अभाव में आम जनता को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। बुनियादी ढांचा मजबूत किए बिना लोगों के जीवन स्तर में सुधार संभव नहीं है। विधायक ने केंद्र से मिलने वाली राशि लंबित रहने के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि 47,367 से अधिक उपयोगिता प्रमाण पत्र केंद्र सरकार को नहीं भेजे गए हैं, जिसके कारण केंद्रीय राशि लंबित है। उन्होंने राज्य के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर से विभागवार लंबित राशि का विवरण सदन में प्रस्तुत करने की मांग की। साथ ही सभी सांसदों और विधायकों की संयुक्त बैठक बुलाकर केंद्र से राज्य का अधिकार सुनिश्चित करने का सुझाव दिया। अबुआ आवास योजना पर सरकार को घेरते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2024-25 में 6.5 लाख आवास निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन अब तक केवल 18,849 आवास ही पूर्ण हो सके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई स्थानों पर गरीबों के मकान अधूरे पड़े हैं और जर्जर स्थिति में पहुंच गए हैं। नीरा यादव ने पाकुड़ और दुमका जिले के जरमुंडी क्षेत्र में जियो टैगिंग में अनियमितता तथा लाभुकों को किस्त भुगतान में देरी का आरोप लगाया। साथ ही विधानसभा समिति को गलत जानकारी दिए जाने का मामला भी उठाया। उन्होंने कहा कि कोडरमा की एक सड़क का निर्माण दिसंबर 2025 में पूरा हो चुका था, जबकि 10 जनवरी 2026 को समिति को बताया गया कि कार्य शुरू ही नहीं हुआ है। इस मामले में संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध जांच एवं कार्रवाई की मांग की गई। मनरेगा के नाम को लेकर चल रही बहस पर उन्होंने कहा कि “राम” नाम से परहेज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी की समाधि का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां भी “हे राम” अंकित है। डीएमएफटी फंड के उपयोग पर सवाल उठाते हुए विधायक ने आरोप लगाया कि खनन प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों के बजाय अधिकतर राशि शहरी इलाकों में खर्च की जा रही है। उन्होंने कहा कि कोडरमा में इंजीनियरिंग कोचिंग के नाम पर एक निजी कंपनी को 1.88 करोड़ रुपये दिए गए, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। स्कूलों में थाली और ग्लास खरीद पर 78 लाख रुपये खर्च किए जाने पर भी उन्होंने आपत्ति जताई। इसके अलावा चंदवारा, डोमचांच और सतगावां प्रखंड के जंगल क्षेत्रों में बाहरी लोगों को बसाए जाने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि हजारों लोगों के आधार एवं मतदाता पहचान पत्र बनाकर वन पट्टा दिया जा रहा है, जिससे स्थानीय लोगों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने इस मामले में तत्काल कार्रवाई की मांग की। वहीं, सदन में विधायक राजेश कच्छप ने राज्य के 49 अंचलों में अंचल अधिकारी (सीओ) के रिक्त पदों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि 72 अंचलों में प्रशिक्षु अधिकारियों से नियमित कार्य लिया जा रहा है, जबकि उन्हें प्रशिक्षण अवधि की सुविधाएं दी जा रही हैं, जो वित्तीय अनियमितता का विषय है। इस पर जवाब देते हुए राज्य के राजस्व मंत्री दीपक बिरुआ ने कहा कि राज्य में अधिकारियों की कमी है। कुछ अधिकारियों को प्रोन्नति देकर पदस्थापित किया गया है। वहीं 46 अधिकारी एसडीएम रैंक में हैं, जिनका पदस्थापन अभी शेष है। उन्होंने आश्वासन दिया कि प्रशिक्षण पूर्ण होते ही एसडीएम रैंक के अधिकारियों का शीघ्र पदस्थापन किया जाएगा।
लातेहार के तापखास-चंदनडीह विस्थापन का मुद्दा गरमाया, भूमिहीन परिवारों के पुनर्वास की उठी मांग : झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के आठवें दिन शुक्रवार को लातेहार जिले के तापखास और चंदनडीह क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का मामला सदन में उठा। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक प्रकाश राम ने प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की मांग की। विधायक प्रकाश राम ने कहा कि तापखास क्षेत्र में पिछले 40 से 50 वर्षों से रह रहे अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के लोगों को अतिक्रमण के नाम पर हटाने के लिए प्रशासन की ओर से नोटिस देकर दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने दशकों से वहां अपना घर बसाया है, उन्हें अचानक विस्थापित करना उचित नहीं है। उन्होंने सदन को बताया कि चंदनडीह में 266 लोगों को अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के तहत हटाया गया है और बदले में उन्हें मात्र दो-दो डिसमिल जमीन दी गई है। विधायक ने मांग की कि इनमें शामिल 155 भूमिहीन परिवारों के लिए आवास की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। इस पर जवाब देते हुए विभागीय मंत्री दीपक बिरूआ ने कहा कि जहां सरकार की ओर से बंदोबस्ती की गई है, वहां लाभुकों को नियमानुसार स्थानांतरित होना चाहिए। उन्होंने आश्वासन दिया कि पूरे मामले की रिपोर्ट मंगाकर जांच कराई जाएगी और नियमों के अनुरूप कार्रवाई की जाएगी। मामले पर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरकार को घेरते हुए कहा कि बिना समुचित सर्वेक्षण और प्रभावित लोगों की पहचान किए विस्थापन की कार्रवाई करना गलत है। उन्होंने कहा कि आदिवासी परिवार दो डिसमिल जमीन पर न तो व्यवस्थित रूप से घर बना सकते हैं और न ही पशुपालन या आजीविका से जुड़ी गतिविधियां संचालित कर सकते हैं। मरांडी ने सरकार से स्पष्ट मापदंड तय करने की मांग करते हुए कहा कि विस्थापित परिवारों को कम से कम सात डिसमिल जमीन उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सकें। इस पर मंत्री दीपक बिरूआ ने कहा कि यदि ऐसी मांग आती है तो सात डिसमिल तक जमीन बंदोबस्ती देने के प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि पात्र लाभुक यदि किसान श्रेणी में आते हैं तो उन्हें वन पट्टा योजना का लाभ भी दिया जा सकता है।
