Eksandeshlive Desk
रांची : कई दंपती यह जानकर चौंक जाते हैं कि 40 की उम्र में दूसरे बच्चे की कोशिश करना पहली बार से कहीं ज़्यादा कठिन साबित हो सकता है। डॉ. विनीता कुमारी, फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट, बिरला फर्टिलिटी एंड आईवीएफ, रांची का कहना है कि अक्सर पहला गर्भधारण बिना किसी परेशानी के, प्राकृतिक तरीके से हो जाता है, जिससे यह धारणा बन जाती है कि शरीर उसी हिसाब से दोबारा अपना काम कर देगा। लेकिन सच्चाई यह है कि उम्र के साथ फर्टिलिटी बदलती रहती है भले ही पहले सब कुछ आसानी से हुआ हो। महिलाओं में फर्टिलिटी पर उम्र का असर मासिक धर्म बंद होने से बहुत पहले ही शुरू हो जाता है।
कई बार मासिक धर्म नियमित रहता है, फिर भी अंडाणुओं की गुणवत्ता धीरे-धीरे कम होती जाती है। 40 की शुरुआत तक आते-आते अंडाणुओं में जेनेटिक गड़बड़ियों की संभावना बढ़ जाती है। इसका सीधा असर भ्रूण के गर्भ में ठहरने पर पड़ता है और मिसकैरेज का जोखिम भी बढ़ जाता है। दो गर्भधारण के बीच का समय भी अहम होता है। इस दौरान गर्भाशय में फाइब्रॉइड, एडिनोमायोसिस या एंडोमेट्रियोसिस जैसी समस्याएं बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित हो सकती हैं। पहले की सिज़ेरियन डिलीवरी या गर्भाशय से जुड़ी किसी प्रक्रिया के कारण अंदरूनी निशान भी रह सकते हैं, जो इम्प्लांटेशन में बाधा बनते हैं भले ही स्कैन सामान्य क्यों न दिखें। हार्मोन से जुड़े टेस्ट, गर्भाशय की विस्तृत जांच और सीमेन एनालिसिस—कभी-कभी स्पर्म डीएनए टेस्टिंग के साथ स्थिति को साफ़ समझने में मदद करते हैं। यह सफ़र पहले अनुभव को दोहराने का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि समय के साथ फर्टिलिटी में क्या बदलाव आए हैं और उसी के अनुसार सही कदम उठाने का।
