21 विजेताओं में छह महिलाएं, माला कुजूर 997 वोट के साथ 32वें स्थान पर; वरिष्ठों की ‘सबसे अधिक मत’ देने की अपील भी बेअसर
Ranjeet Kumar
रांची: फेडरेशन ऑफ झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (FJCCI) के चुनाव परिणाम ने प्रतिनिधित्व की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने रखी हैं। 21 सदस्यीय नई कार्यकारिणी में छह महिलाओं ने जीत दर्ज कर व्यापारिक नेतृत्व में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का मजबूत संकेत दिया है। दूसरी ओर आदिवासी महिला उद्यमी माला कुजूर 997 मत हासिल कर 32वें स्थान पर रहीं और कार्यकारिणी में जगह नहीं बना सकीं। इसके साथ ही झारखंड के सबसे प्रभावशाली व्यापारिक संगठनों में शामिल चैंबर में आदिवासी प्रतिनिधित्व का सवाल फिर सामने आ गया है। चुनाव में महिला उम्मीदवारों का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। विनीता सिंघानिया 1,597 मतों के साथ पांचवें और ज्योति कुमारी 1,535 मतों के साथ छठे स्थान पर रहीं। इनके अलावा निधि झुनझुनवाला को 1,450, आस्था किरण को 1,441, मोनिका गोयनका को 1,300 और पूजा ढाढा को 1,288 मत मिले। इस तरह 21 सदस्यीय कार्यकारिणी में छह महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 29 प्रतिशत हो गई है। दो महिला उम्मीदवारों का शीर्ष छह में रहना भी चैंबर में महिलाओं की मजबूत होती भूमिका को दर्शाता है।
माला को सबसे अधिक मत देने की हुई थी अपील: माला कुजूर की उम्मीदवारी इस चुनाव में केवल एक प्रत्याशी की दावेदारी तक सीमित नहीं थी। पूर्व सांसद महेश पोद्दार, चैंबर के पूर्व अध्यक्ष किशोर मंत्री के अलावा चैंबर से जुड़े कई वरिष्ठ लोगों ने सदस्यों से माला कुजूर को सबसे अधिक मत देने की अपील की थी। इसके पीछे उद्देश्य आदिवासी महिला उद्यमी को चैंबर की मुख्यधारा में मजबूत प्रतिनिधित्व दिलाने के साथ सरकार तक एक बड़ा संदेश पहुंचाना भी था। वरिष्ठ सदस्यों की अपील का आशय यह था कि चुनाव परिणाम से यह संदेश जाए कि झारखंड चैंबर केवल चार-पांच समाज या समुदाय के व्यापारियों का संगठन नहीं, बल्कि हर वर्ग और समाज के कारोबारियों का प्रतिनिधित्व करने वाला मंच है। इसी कारण माला कुजूर को केवल निर्वाचित कराने के बजाय सर्वाधिक मतों से जिताने की अपील की गई थी। लेकिन चुनाव परिणाम उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहा। माला 997 मतों के साथ 32वें स्थान पर रहीं।
राजनीति में आदिवासी नेतृत्व मजबूत, व्यापार में तस्वीर अलग: झारखंड के संदर्भ में यह परिणाम इसलिए भी विचारणीय है क्योंकि राज्य की राजनीति में आदिवासी नेतृत्व की भूमिका हमेशा केंद्रीय रही है। राज्य गठन के बाद रघुवर दास को छोड़कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आदिवासी नेताओं का ही वर्चस्व रहा है। इसके बावजूद संगठित व्यापार और उद्योग के प्रमुख निर्णयकारी मंचों पर आदिवासी समाज की भागीदारी बेहद सीमित दिखाई देती है। ऐसे में माला कुजूर की हार को महज एक उम्मीदवार की चुनावी पराजय के रूप में देखना इस परिणाम की पूरी तस्वीर नहीं होगी। जब चैंबर के वरिष्ठ लोगों ने स्वयं उनकी उम्मीदवारी को संगठन की सामाजिक विविधता से जोड़ते हुए सर्वाधिक मत देने की अपील की थी, तब उनका शीर्ष 21 से भी बाहर रह जाना प्रतिनिधित्व के सवाल को और गहरा करता है।
छह महिलाओं की जीत चुनाव का सकारात्मक पक्ष: दूसरी ओर महिलाओं के लिहाज से चुनाव परिणाम उत्साहजनक रहा। 21 में छह महिलाओं की जीत यानी नई कार्यकारिणी में करीब हर चौथा सदस्य महिला है। यह संकेत है कि झारखंड के संगठित व्यापारिक क्षेत्र में महिला उद्यमियों की स्वीकार्यता और निर्णयकारी भूमिका दोनों बढ़ रही हैं। महिलाओं की इस मजबूत मौजूदगी के बीच आदिवासी प्रतिनिधित्व का अभाव एक स्पष्ट विरोधाभास भी सामने रखता है। सवाल यह नहीं कि किसी प्रत्याशी को उसकी सामाजिक पहचान के आधार पर निर्वाचित किया जाना चाहिए, बल्कि यह है कि आदिवासी बहुल झारखंड के व्यापार और उद्योग के संगठित नेतृत्व में आदिवासी उद्यमियों की भागीदारी इतनी कम क्यों है? चैंबर चुनाव ने इसलिए केवल 21 नए कार्यकारिणी सदस्यों का फैसला नहीं किया है। परिणाम ने एक तरफ महिला नेतृत्व की मजबूत होती तस्वीर दिखाई है, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल भी छोड़ा है कि जिस चैंबर की पहचान हर वर्ग के व्यापारियों की आवाज के रूप में स्थापित करने की कोशिश है, उसकी निर्वाचित कार्यकारिणी में झारखंड की सामाजिक विविधता कितनी दिखाई देती है।
