Edit by Sunil Verma
रांची : भारत-अमेरिका प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था, सरकार की चुप्पी व किसान-मछुआरा-पशुपालक समुदाय के भविष्य पर संवैधानिक मंडरा रहे संकट पर भारतीय हलधर किसान यूनियन के राष्टय मुख्य प्रवक्ता व राष्ट्रीय कोर कमेटी के उपाध्यक्ष डॉ. शैलेश कुमार गिरि ने किसानों के हितों में एक जोरदार व सकारात्मक पहल करते हुए संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर धीरेन्द्र सिंह सोलंकी व राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधीर सिंह राघव के साथ अपराह्न 1 बजे से 2 बजे तक एक लंबी आॅनलाइन बैठक व विस्तृत वार्तालाप किया। बैठक के उपरांत डॉ. शैलेश कुमार गिरि ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए देशवासियों, देश के सभी राज्यों के किसानों, मछुआरों, पशुपालकों तथा सभी किसान संगठनों का हुंकार करते हुए कहा कि भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित टैरिफ व व्यापार व्यवस्थाओं को लेकर देश के अन्नदाता व ग्रामीण आजीविका से जुड़े समुदायों में गंभीर चिंता व्याप्त है। भारतीय हलधर किसान यूनियन का स्पष्ट मत है कि यदि कृषि, मछुआरा, डेयरी, पशुपालन, खाद्य-प्रसंस्करण व अन्य संबद्ध ग्रामीण क्षेत्रों में असमान टैरिफ संरचना (जैसे 18% बनाम 0%) लागू की जाती है, तो इसका दुष्प्रभाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के करोड़ों मछुआरों, पशुपालकों व ग्रामीण श्रमिकों की आजीविका पर सीधा आघात करेगा। भारत का मछुआरा समुदाय—चाहे वह समुद्री हो या अंतर्देशीय—पहले से ही लागत, बाज़ार अस्थिरता व आय सुरक्षा के संकट से जूझ रहा है। ऐसे में विदेशी उत्पादों को अनुचित टैरिफ लाभ देकर भारतीय उत्पादकों को असमान प्रतिस्पर्धा में धकेलना, संविधान की आत्मा और ग्रामीण भारत के हितों के विपरीत होगा। डॉ. शैलेश कुमार गिरि ने बैठक के पश्चात कहा कि कृषि, मछुआरा व पशुपालन, ये तीनों भारत की खाद्य संप्रभुता व ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में इनकी अनदेखी हुई, तो यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि एक गहरा संवैधानिक संकट होगा। उन्होंने कहा कि पूर्व में कई बार ऐसे नीतिगत निर्णय देखने को मिले हैं, जिनकी जानकारी पहले अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दी गई व देश के किसान-मछुआरे-पशुपालकों ने बाद में उसके दुष्परिणाम झेले। ऐसे में भारत सरकार की मौजूदा चुप्पी, स्वाभाविक रूप से आशंकाओं को जन्म देती है। भारतीय हलधर किसान यूनियन भारत सरकार से निम्नलिखित प्रश्नों पर स्पष्ट, लिखित और सार्वजनिक उत्तर की मांग करती है कि 1. संवैधानिक दायित्व के तहत क्या प्रस्तावित भारत-अमेरिका टैरिफ/ट्रेड समझौते में अनुच्छेद 38, 39(ु), 39(ू), 43, 47 एवं 48 (कृषि, मछुआरा, पशुपालन और पोषण सुरक्षा) का विधिवत परीक्षण किया गया है? कृषि एवं मत्स्य—राज्य सूची के विषय होने के बावजूद—क्या सभी राज्यों एवं तटीय राज्यों से औपचारिक परामर्श लिया गया? किसान-मछुआरा आय सुरक्षा क्या इस टैरिफ व्यवस्था का टरढ मछली न्यूनतम मूल्य दुग्ध एवं पशुधन मूल्य पर प्रभाव अध्ययन कराया गया है? यदि कराया गया है, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? फळक के अंतर्गत प्रश्न भारत सरकार और अमेरिका के बीच कृषि, मछुआरा एवं डेयरी से संबंधित: बैठकों की तिथियाँ एजेंडा कायर्वृत्त ड्राफ्ट प्रस्ताव सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए? क्या इन वार्ताओं पर किसी प्रकार का अंतरराष्ट्रीय दबाव या समयसीमा लागू है? क्या इस प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था को संसद में पूर्ण बहस हेतु प्रस्तुत किया जाएगा? क्या किसान, मछुआरा और पशुपालक संगठनों को सुने बिना ऐसा कोई समझौता लागू किया जा सकता है? भारतीय किसान-मछुआरों को संभावित नुकसान की भरपाई का तंत्र क्या होगा? डॉ. शैलेश कुमार गिरि ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ह्लयदि भविष्य में यह प्रमाणित हुआ कि भारत-अमेरिका टैरिफ व्यवस्था से किसान, मछुआरा या पशुपालक समुदाय प्रभावित हुआ, तो देश के सभी किसान, मछुआरे और किसान संगठन एक बड़े, ऐतिहासिक, लोकतांत्रिक और संवैधानिक आंदोलन के लिए तैयार रहेंगे।ह्व यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के विरुद्ध नहीं, भारत के अन्नदाता और ग्रामीण भारत की रक्षा के लिए होगा। भारतीय हलधर किसान यूनियन की प्रमुख मांगें सभी प्रस्तावित टैरिफ समझौतों को सार्वजनिक किया जाए संसद में विस्तृत बहस कराई जाए ।किसान-मछुआरा- पशुपालक संगठनों से औपचारिक विमर्श हो ,टरढ, मत्स्य मूल्य संरक्षण और ग्रामीण बाज़ार से कोई समझौता न हो।
