लोकसभा से दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक-2025 पारित

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Eksandeshlive Desk

नई दिल्ली : लोकसभा ने सोमवार को ध्वनि मत से हितधारकों के बीच व्याख्या संबंधी मुद्दों को सुलझाने के लिए लाया गया दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक-2025 पारित कर दिया। इस विधेयक का उद्देश्य दिवाला और दिवालियापन संहिता-2016 में और संशोधन करना है। लोकसभा ने सोमवार को ध्वनि मत से ‘इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (संशोधन) विधेयक-2025′ पारित कर दिया। यह विधेयक शुरू में एक प्रवर समिति के पास भेजा गया था। इसे इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड 2016 में और संशोधन करने के लिए पेश किया गया है, ताकि कंपनियों और व्यक्तियों के बीच प्रक्रियागत देरी और व्याख्या संबंधी मुद्दों का समाधान किया जा सके। लोकसभा में दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025’ पर हुई विस्तृत चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि दिवाला और दिवालियापन संहिता का उद्देश्य कभी भी केवल ऋण वसूली के तंत्र के रूप में काम करना नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य व्यवहार्य व्यवसायों को बचाने, वित्तीय संकट को हल करने और उद्यम के मूल्य को बनाए रखने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करना था।

निर्मला सीतारमण ने चर्चा के दौरान कहा कि दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) संशोधन विधेयक में कुल 12 संशोधन हैं, जिनमें से 11 चयन समिति के सुझाए गए हैं और एक सरकार ने पेश किया है। इस विधेयक के बारे में उन्होंने कहा कि दिवाला और दिवालियापन संहिता देश के बैंकिंग क्षेत्र की सेहत सुधारने में खासकर स्ट्रेस्ड एसेट्स (तनावग्रस्त संपत्तियों) को सुलझाने में, एक अहम कारक रहा है। सीतारमण ने लोकसभा में दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2025′ पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए बताया कि दिसंबर, 2025 तक दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) ने 1,376 कंपनियों के समाधान में मदद की है, जिससे लेनदारों को 4.11 लाख करोड़ रुपये की वसूली हो पाई है। उन्होंने आगे कहा कि इस कानून का मकसद कभी भी सिर्फ़ कर्ज़ वसूली के एक ज़रिया के तौर पर काम करना नहीं था। वित्त मंत्री ने चर्चा के दौरान सदन को बताया यह विधयेक उस कम इस्तेमाल होने वाली ‘फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया’ की जगह लेगा, जो असल में छोटे व्यवसायों के लिए कम समय-सीमा वाला एक सीआईआरपी ही था। उन्होंने कहा कि पिछली व्यवस्था का पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पाया था। अब इसकी जगह एक नई, लेनदार-द्वारा-शुरू की जाने वाली दिवालियापन व्यवस्था लाई जा रही है, जिसमें अदालत के बाहर समझौते, ‘देनदार के पास नियंत्रण’ (कब्जेदार ऋणी) और ‘लेनदार के पास नियंत्रण’ (नियंत्रणकर्ता लेनदार) जैसे मॉडल शामिल हैं।

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