या हुसैन ,या हुसैन के नारे से गूंजा मुहर्रम का जुलूस, इमाम ए हुसैन की शहादत को किया गया याद

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sunil
रांची: राजधानी में मुहर्रम के अवसर पर मुस्लिम समुदाय की ओर से इमाम ए हुसैन की याद में मुहर्रम का जुलूस विभिन्न जगहों पर से निकाला गया। रांची के मेन रोड सहित अन्य स्थानों से बाजे – गाजे के साथ जुलूस में लाखो लोग पहुंचे । इमाम ए हुसैन की शहादत की याद में शिया समुदाय के लोग सीनाजनी करते हैं और जंजीरी मातम कर खुद के शरीर को लहुलुहान करते दिखे । इस दौरान या हुसैन या हुसैन के नारे हर तरफ सुनाई दिए. लोगों ने एक से बढ़कर एक ताजिए भी निकाले। पैगंबर मोहम्मद के पोते इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए मुहर्रम मनाया जाता है। अंजुमन इस्लामिया रांची से जुड़े शाहीन अहमद ने बताया कि इमाम हुसैन रसूलुल्लाह के छोटे नवासे हजरत फातमा और हजरत अली के साहबजादे थे। माविया के बाद यदीज तख्त पर बैठा। उसने सबसे बैत लेनी शुरू की। इमाम ए हुसैन ने यजीद की बैत लेने से इंकार कर दिया। यजीद की बैत का मतलब यह था कि उसे खलिफा-ए-रसूल मान लिया जाये। इमाम हुसैन उसे बादशाह तो मानते थे मगर खलिफा-ए-रसूल नहीं। इमाम हुसैन यह जानते थे कि इंकार की कीमत उन्हें अदा करनी होग। उन्होंने तय किया कि वह यजीद की बैत नहीं करेंगे। इंकार के साथ ही हुसैन को शहीद करने की कोशिश शुरू हो गयी। जब हुसैन साहब ने हज को उमरा में तब्दील किया तो उनके साथ अरब के अजिजों और दोस्तों ने चलने का मन बना लिया। हुसैन के साथ ख्वातीन और बच्चे भी थे। कुछ लोगों ने इमाम हुसैन को मशवरा दिया कि सफर में ख्वातीन को साथ न ले जायें। हजरत जैनब और हजरत इमाम हुसैन के दोस्तों ने इसका विरोध किया। वह जानते थे कि हजरत हुसैन जिस सफर में जा रहे हैं वह कोई आसान सफर नहीं है। उनका यह सफर इस्लाम की हिफाजत के लिए है। इमाम हुसैन के साथ उनकी बीवी हजरत अबुल बनीन ने अपने चारों बेटों खास तौर पर बड़े बेटे अब्बास को इमाम हुसैन के साथ कर दिया।

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