चरही से बड़कागांव तक अवैध कोयले का खेल, रात की गतिविधियों की भनक स्थानीय पुलिस को क्यों नहीं
हजारीबाग। जिले के कोयला क्षेत्रों में अवैध खनन, भंडारण व परिवहन का मामला एक बार फिर चर्चा में है। पिछले कुछ समय में सीआईएसएफ व सीसीएल सुरक्षा टीमों की लगातार कार्रवाई में बड़ी मात्रा में अवैध कोयला व वाहन पकड़े जाने के बाद अब संबंधित थाना क्षेत्रों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। सवाल यह है कि जिन इलाकों में रात के अंधेरे में कोयला निकाला, जमा किया तथा वाहनों के जरिए ढोया जा रहा है, वहां की स्थानीय पुलिस को इसकी जानकारी समय रहते क्यों नहीं मिलती। हाल की कार्रवाई को देखें तो 4 अक्टूबर को चरही थाना क्षेत्र के इंद्रा ग्राम स्थित तापिन परियोजना क्षेत्र में सीआईएसएफ व सीसीएल की संयुक्त टीम ने 129.730 टन अवैध रूप से भंडारित कोयला जब्त किया। जब्त कोयले की कीमत करीब 3.13 लाख रुपये आंकी गई। कार्रवाई से पहले ड्रोन के माध्यम से क्षेत्र की निगरानी की गई व संदिग्ध स्थानों को चिन्हित करने के बाद टीम ने वहां छापेमारी की।
ड्रोन से दिखा कोयला, फिर थाना की निगरानी पर सवाल क्यों?
इंद्रा ग्राम की कार्रवाई में ड्रोन सर्विलांस सबसे महत्वपूर्ण कड़ी रही। पहले हवाई निगरानी की गई, संदिग्ध स्थान चिन्हित किए गए व उसके बाद जमीनी टीम वहां पहुंची। अलग-अलग स्थानों पर बड़ी मात्रा में कोयला जमा मिला। अब सवाल यह है कि यदि किसी क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर कोयला जमा किया जा रहा था, तो स्थानीय थाना की नियमित गश्ती व सूचना तंत्र को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली। क्या कोयला क्षेत्रों में रात के समय पुलिस की पेट्रोलिंग पर्याप्त है? क्या स्थानीय स्तर पर मुखबिर तंत्र सक्रिय है? यदि पुलिस को जानकारी थी तो कार्रवाई कब व किस स्तर पर हुई? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होगा, लेकिन लगातार हो रही बरामदगी ने निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर बहस जरूर खड़ी कर दी है।
बड़कागांव में भी सामने आ चुका है बड़ा खेल
बड़कागांव थाना क्षेत्र के सेहदा-चपरी-जोराकाठ जैसे इलाकों में भी अवैध कोयले को लेकर सुरक्षा एजेंसियां पहले कार्रवाई कर चुकी हैं। जंगल व सुनसान इलाकों में बड़े पैमाने पर कोयला जमा किए जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं। कुछ मामलों में कोयला लदे वाहन भी पकड़े गए हैं। ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल केवल कोयला बरामद करने का नहीं है। सवाल यह भी है कि कोयला कहां से निकाला गया, किसने जमा कराया, वाहन किसके हैं, चालक किसके निर्देश पर माल लेकर निकले व कोयला आखिर कहां पहुंचाया जाना था। जब तक इस पूरी कड़ी की जांच नहीं होगी, तब तक एक जगह से कोयला जब्त होने के बाद दूसरी जगह फिर वही गतिविधि शुरू होने की संभावना बनी रहेगी।
रात का अंधेरा व कोयले की आवाजाही
कोयला क्षेत्रों में अवैध कारोबार का एक बड़ा हिस्सा रात के समय संचालित होने की शिकायतों से जुड़ा रहा है। अंधेरे का फायदा उठाकर वाहनों की आवाजाही व जंगल क्षेत्रों में कोयला जमा किए जाने की बात सामने आती रही है। ऐसे में संबंधित थाना क्षेत्रों में रात्रि गश्ती की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि सीआईएसएफ या सीसीएल की सुरक्षा टीम किसी सूचना पर पहुंचकर बड़ी मात्रा में कोयला बरामद कर सकती है, तो सवाल यह है कि स्थानीय पुलिस की नियमित गश्ती टीमों को ऐसे स्थानों की जानकारी पहले क्यों नहीं मिलती?
एसपी के निर्देश के बाद भी क्यों नहीं थम रहा कारोबार
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 30 सितंबर को हजारीबाग एसपी अमन कुमार ने बड़कागांव थाना का निरीक्षण किया था। इस दौरान कोयला तस्करी पर प्रभावी रोक लगाने व कोयला खनन क्षेत्रों में लगातार पेट्रोलिंग करने को लेकर निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बावजूद कुछ ही दिनों के अंतराल में कोयला क्षेत्रों से बड़ी मात्रा में अवैध कोयले की बरामदगी सामने आना पुलिस की निगरानी व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत बताता है। क्या थाना स्तर पर एसपी के निर्देशों का पालन हो रहा है? क्या कोयला क्षेत्रों की रात में नियमित पेट्रोलिंग होती है? क्या संदिग्ध वाहनों व रास्तों की निगरानी की जा रही है? इन सवालों का जवाब पुलिस प्रशासन को देना होगा।
मिलीभगत या सूचना तंत्र की कमजोरी
अवैध कोयला कारोबार में पुलिस की मिलीभगत का आरोप बिना जांच व प्रमाण के लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन लगातार हो रही बरामदगी के बीच यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर पुलिस के सूचना तंत्र में कमी कहां है। अगर पुलिस को इन गतिविधियों की जानकारी नहीं है तो यह सूचना तंत्र की कमजोरी का मामला है। यदि जानकारी मिलने के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही है तो यह उससे भी गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़ा करता है। यही वजह है कि अब सिर्फ कोयला जब्त करने से आगे बढ़कर पूरे नेटवर्क की जांच की जरूरत है।
सिर्फ कोयला पकड़ना काफी नहीं, स्रोत तक पहुंचे जांच
अवैध कोयला कारोबार पर प्रभावी रोक तभी संभव है, जब कार्रवाई केवल जंगल या रास्ते में खड़े कोयला व वाहनों तक सीमित न रहे। जांच को यह पता लगाने तक ले जाना होगा कि अवैध कोयला किस क्षेत्र से निकला, उसे कहां जमा किया गया, किस वाहन के माध्यम से भेजा गया व अंतिम रूप से किसे आपूर्ति की जानी थी। इंद्रा ग्राम में बरामद 129.730 टन कोयला हो या बड़कागांव क्षेत्र में पकड़े गए वाहन—हर मामले में जब्ती के साथ-साथ स्रोत से लेकर अंतिम खरीदार तक की कड़ी सामने लाना जरूरी है।
अब पुलिस के सामने कई सीधे सवाल
कोयला क्षेत्रों में रात की पेट्रोलिंग कितनी नियमित है? संवेदनशील इलाकों की सूची बनाकर निगरानी की जा रही है या नहीं? सीआईएसएफ व सीसीएल से मिलने वाली सूचनाओं पर स्थानीय थाना कितनी तेजी से कार्रवाई करता है? बड़े पैमाने पर कोयला बरामद होने के बाद उसके स्रोत व खरीदार तक जांच क्यों नहीं पहुंचती? सबसे महत्वपूर्ण—लगातार कार्रवाई के बावजूद अवैध कारोबार पूरी तरह रुक क्यों नहीं पा रहा है।इन सवालों के जवाब सिर्फ पुलिस कार्रवाई की संख्या से नहीं, बल्कि अवैध कोयले की सप्लाई चेन तोड़ने की कार्रवाई से मिलेंगे। फिलहाल सीआईएसएफ व सीसीएल की लगातार कार्रवाई ने इतना जरूर साफ कर दिया है कि कोयला क्षेत्रों में अवैध गतिविधियों की निगरानी का सवाल खत्म नहीं हुआ है। अब निगाह इस बात पर है कि स्थानीय पुलिस व जिला प्रशासन इस चुनौती से निपटने के लिए आगे क्या ठोस कदम उठाते हैं।
