संजय पाण्डेय
पलामू: पलामू प्रमंडल, जो अपनी अनूठी भौगोलिक परिस्थितियों और संघर्षों के लिए जाना जाता है, आज यहाँ की युवा प्रतिभाएं एक नए और बेहद संवेदनशील संकट से जूझ रही हैं। यह संकट है योग्य और मेधावी होने के बावजूद उच्च शिक्षा, विशेषकर विदेशी विश्वविद्यालयों में दाखिले से वंचित रह जाना। हैरान करने वाली बात यह है कि इन छात्रों के पैर गरीबी ने नहीं, बल्कि बैंकिंग व्यवस्था की उदासीनता और जिला प्रशासन की लापरवाही ने जकड़ रखे हैं।
बैंकों का अड़ियल रवैया: पलामू के छात्रों को नहीं मिल रही मदद
कहने को तो केंद्र और राज्य सरकारें ‘पढ़ें चलो, बढ़ें चलो’ और ‘स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड’ जैसी लोक-लुभावन योजनाओं का ढिंढोरा पीटती हैं। बैंकों को स्पष्ट निर्देश हैं कि मेधावी छात्रों को उच्च शिक्षा और विदेशी शिक्षा के लिए प्राथमिकता के आधार पर ‘एजुकेशन लोन’ (शिक्षा ऋण) मुहैया कराया जाए। लेकिन पलामू में जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
प्रबंधकों की मनमानी: पलामू के विभिन्न बैंक प्रबंधकों की लापरवाही और संवेदनहीनता के कारण छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। बैंक नियमों का हवाला देकर महीनों तक फाइलों को दबाए रखते हैं। गारंटी और कागजी कार्रवाई का मकड़जाल: लोन के लिए चक्कर काट रहे छात्रों और उनके अभिभावकों से ऐसे-ऐसे दस्तावेजों और गारंटियों की मांग की जाती है, जिसे पूरा करना एक मध्यमवर्गीय या ग्रामीण परिवार के लिए असंभव है। टालमटोल की नीति: जब कोई छात्र विदेश के किसी प्रतिष्ठित संस्थान का दाखिला पत्र लेकर बैंक पहुंचता है, तो उसे सहयोग करने के बजाय बैंक अधिकारी इस टेबल से उस टेबल पर दौड़ाते हैं, जिससे दाखिले की समय-सीमा समाप्त हो जाती है।
विदेशों में पढ़ने का मौका मिला, पर पैसे के अभाव में अब तक कई का टूटा सपना
पलामू की मिट्टी में प्रतिभा की कमी नहीं है। यहाँ के दर्जनों छात्र-छात्राओं ने अपनी मेहनत के दम पर दुनिया के नामी-गिरामी विदेशी विश्वविद्यालयों में स्कॉलरशिप या दाखिला हासिल किया है। लेकिन जब उड़ान भरने का समय आता है, तो उनके पंख काट दिए जाते हैं।
एक कड़वी सच्चाई है की पलामू के कई ऐसे मेधावी छात्र हैं, जिन्हें सात समंदर पार जाकर देश और राज्य का नाम रोशन करने का मौका मिला। वीजा और पासपोर्ट तैयार हैं, लेकिन बैंक से समय पर शिक्षा ऋण न मिलने के कारण वे आज अवसाद (स्ट्रेस) की स्थिति में हैं। पैसे के अभाव में वे विदेश नहीं जा पा रहे हैं। एक गरीब या मध्यमवर्गीय माता-पिता के लिए अचानक लाखों रुपये की व्यवस्था करना मुमकिन नहीं है, और बैंक उनकी सुनने को तैयार नहीं हैं।
जिला प्रशासन की सुस्ती भी एक मुख्य कारण है. निगरानी तंत्र पूरी तरह फेल
इस पूरी बर्बादी में केवल बैंक ही नहीं, बल्कि पलामू का जिला प्रशासन भी बराबर का कसूरवार है। प्रशासन का काम केवल फाइलों को आगे बढ़ाना या बैठकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह देखना भी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र युवाओं तक पहुंच रहा है या नहीं।
समीक्षा बैठकों की औपचारिकता: जिला स्तर पर ‘जिला स्तरीय बैंकर्स समिति’ की बैठकें तो होती हैं, लेकिन उनमें शिक्षा ऋण की प्रगति और छात्रों की समस्याओं पर कोई गंभीर विमर्श या कड़ा फैसला नहीं लिया जाता।
शिकायत निवारण तंत्र का अभाव: परेशान छात्र जब अपनी गुहार लेकर समाहरणालय पहुंचते हैं, तो उन्हें केवल आश्वासन मिलता है। प्रशासन द्वारा बैंकों पर ऐसा कोई दबाव नहीं बनाया जाता जिससे प्रबंधकों की जवाबदेही तय हो सके।
आखिर यह लापरवाही है किसकी? (जवाबदेही तय होना जरूरी) यह पलामू के पूरे सिस्टम की विफलता है।
बैंकों की कॉरपोरेट संवेदनहीनता: बैंक बड़े उद्योगपतियों को करोड़ों का लोन आसानी से दे देते हैं, लेकिन जब देश के भविष्य (छात्रों) के निर्माण के लिए चंद लाख रुपये देने की बात आती है, तो वे पल्ला झाड़ लेते हैं।जिला प्रशासन की ढीली कमान के कारण ही बैंक बेलगाम हैं। अगर प्रशासन शिक्षा ऋण के मामलों की साप्ताहिक समीक्षा करे और दोषी प्रबंधकों के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा करे, तो स्थिति बदल सकती है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी: स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों को भी चुनाव के अलावा युवाओं के इस गंभीर संकट से कोई सरोकार नजर नहीं आता।
निष्कर्ष और समाधान: अब जागने का वक्त है
पलामू के छात्रों का जीवन बर्बाद होने से बचाना है तो तत्काल प्रभावी कदम उठाने होंगे:
विशेष सेल का गठन: उपायुक्त (DC) पलामू को तत्काल एक ‘छात्र सहायता सेल’ का गठन करना चाहिए, जो सीधे बैंकों से समन्वय कर शिक्षा ऋण की फाइलों का निपटारा कराए। बैंकों पर कड़ा रुख: जो बैंक प्रबंधक मेधावी छात्रों को नियमानुसार लोन देने में आनाकानी करते हैं, उन पर प्रशासनिक कार्रवाई होनी चाहिए। जागरूकता और कानूनी मदद: छात्रों को उनके अधिकारों और प्रेस/कानूनी नियमों के तहत अपनी बात मजबूती से रखने की दिशा में भी जागरूक करना होगा।
यदि समय रहते पलामू का प्रशासन और बैंकिंग सेक्टर अपनी इस घोर लापरवाही से बाहर नहीं निकला, तो पलामू की एक पूरी पीढ़ी का भविष्य और उनका आत्मसम्मान इस संवेदनहीन व्यवस्था की भेंट चढ़ जाएगा।
