जनसांख्यिकी और नए आर्थिक क्षेत्रों के चलते भारत के पास विकास की लंबी संभावना : जयशंकर

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Eksandeshlive Desk

नई दिल्ली: विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने रविवार को कहा कि भारत के सामने अगले पांच से दस वर्षों में ही नहीं बल्कि आने वाले दशकों में भी उच्च आर्थिक वृद्धि की संभावना है। उन्होंने इसके पीछे देश की जनसांख्यिकी और नई आर्थिक संभावनाओं को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, दुनिया तेजी से बदल रही है और भारत के पास औद्योगीकरण के पारंपरिक रास्ते से अलग नए अवसर तलाशने की क्षमता है। विदेश मंत्री ने रविवार को 62वें म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन को संबोधित किया। जयशंकर ने इस दौरान भारत की विकास यात्रा, यूरोप के साथ बढ़ती साझेदारी और बदलती वैश्विक व्यवस्था पर भारत का दृष्टिकोण रखा। इसमें उन्होंने भारत के संदर्भ में आने वाले दशकों तक उच्च आर्थिक वृद्धि की संभावना जताई। साथ ही विश्व के अन्य देशों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर दिए।

डॉ. जयशंकर ने कहा कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने अपनी पसंद के अनुसार खुद को नए तरीके से स्थापित किया है और कुछ हद तक अधिक अकेली शक्ति की भूमिका अपनाई है। दूसरी प्रमुख विशेषता चीन का उभार है। उन्होंने कहा कि अमेरिका-चीन के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, जिसका असर अन्य देशों पर भी पड़ रहा है। इस प्रतिस्पर्धा के बीच देशों की आपसी निर्भरता भी बनी हुई है। उन्होंने कहा कि उभरती और मध्य शक्तियां अपने हितों के अनुरूप एक-दूसरे के साथ सहयोग बढ़ा रही हैं। उन्होंने क्वाड, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा और ब्रिक्स का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और आपदा-रोधी बुनियादी ढांचा गठबंधन जैसी पहल भी देशों के बीच सहयोग के नए स्वरूप को दर्शाती हैं। जयशंकर ने कहा कि बदलती वैश्विक व्यवस्था ने बहुध्रुवीयता के उभार को तेज किया है। बढ़ती परस्पर निर्भरता के कारण देशों के लिए किसी एक खेमे से पूरी तरह अलग रहना संभव नहीं है। ऐसे में वे अपने हितों के अनुसार विभिन्न शक्तियों के साथ संबंध बनाएंगे और जोखिमों को संतुलित करते हुए सहयोग करेंगे।

विदेश मंत्री ने कहा कि देशों के लिए ऐसे साझेदारों के साथ संबंध बनाना जरूरी होता जा रहा है, जिनके साथ उनके हित हमेशा पूरी तरह मेल नहीं खाते। इसे उन्होंने जोखिम संतुलित करते हुए आगे बढ़ने की रणनीति बताया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जैसी प्रमुख बहुपक्षीय संस्था में गतिरोध दिखाई दे रहा है। इसके परिणामस्वरूप छोटे समूहों और सीमित दायरे वाले सहयोग के नए प्रारूप उभर रहे हैं। जयशंकर ने आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती को उभरती शक्तियों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि किसी क्षेत्र में प्रभावशाली बनने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होना जरूरी नहीं है। उन्होंने चिप निर्माण और मशीनरी का उदाहरण दिया। स्वास्थ्य क्षेत्र में एपीआई और दवाओं के उत्पादन को अलग-अलग देशों में विकसित करना जरूरी बताया, ताकि स्वास्थ्य सुरक्षा और आपूर्ति में विविधता सुनिश्चित हो सके। विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता भारत-यूरोप संबंधों में बड़ा बदलाव ला सकता है। एफटीए दोनों पक्षों को गंभीर साझेदार बनाएगा और कारोबार, नियामक संस्थाओं तथा नौकरशाही के बीच बेहतर समझ विकसित करेगा। उन्होंने कहा कि इसका असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे संबंधों पर पड़ेगा और सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे।

विदेश मंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है। यूरोप के पास नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण तकनीक और कारोबारी विशेषज्ञता है। भारत यूरोप की बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को देश में आकर्षित करना चाहता है। उन्होंने कहा कि भारत के महत्वाकांक्षी नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने में यूरोप महत्वपूर्ण भागीदार हो सकता है। उन्होंने भारत-रूस संबंधों को ऐतिहासिक और व्यापक बताते हुए कहा कि दोनों देशों के रिश्ते 1950 के दशक से मजबूत रहे हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ संबंध रक्षा और परमाणु सहयोग से आगे बढ़कर व्यापार, निवेश, ऊर्जा, संसाधन और अंतरिक्ष तक विस्तृत हुए हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भारत की स्थिति स्पष्ट बताते हुए उन्होंने कहा कि युद्ध का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए। भारत रूस और यूक्रेन दोनों से संपर्क में है और काला सागर में जहाजों की सुरक्षा, अनाज व ऊर्जा निर्यात तथा हमले रोकने जैसे मुद्दों पर बातचीत में मदद कर रहा है।

ईरान के मुद्दे पर जयशंकर ने कहा कि भारत की प्राथमिक चिंता संघर्ष के कारण ऊर्जा और व्यापार में उत्पन्न व्यवधान है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा बाजार अस्थिर हुए हैं, जिसका असर लोगों की रसोई, रोजगार और आजीविका पर पड़ता है। भारत चाहता है कि ऊर्जा, व्यापार और लोगों की आवाजाही का निर्बाध प्रवाह बहाल हो। उन्होंने उम्मीद जताई कि समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में जयशंकर ने कहा कि भारत एआई को सुलभ और किफायती बनाने तथा सामाजिक-आर्थिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने पर जोर देता है। उन्होंने कहा कि देश ने डिजिटल क्षमताओं का इस्तेमाल शासन और सामाजिक बदलाव के लिए किया है। भारत ऐसी एआई व्यवस्था चाहता है जिसके उपयोग लोगों की वास्तविक जरूरतों से जुड़े हों। साथ ही, एआई की सुरक्षा और संरक्षा के मुद्दों को केवल बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

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