News by Deepak Yadav
Ranchi : झारखंड सरकार द्वारा प्रस्तुत 2026–27 का राज्य बजट एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि राज्य की विकास नीति का केंद्र सामाजिक समावेशन और कल्याण है। ‘अबुआ दिशोम’ की भावना के साथ पेश किया गया यह बजट न केवल सरकारी प्राथमिकताओं को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी बताता है कि विकास को किस तरह आम जनजीवन से जोड़ा जा सकता है। इस बजट की सबसे उल्लेखनीय विशेषता महिलाओं और बच्चों पर केंद्रित पहलकदमियाँ हैं। ‘मईयां सम्मान योजना’ के माध्यम से महिलाओं को मासिक आर्थिक सहायता देने का निर्णय महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा सकता है। इसके साथ ही महिला किसानों के लिए विशेष सहायता योजनाएँ शुरू करने का प्रस्ताव यह संकेत देता है कि सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका को औपचारिक मान्यता देना चाहती है।शिक्षा के क्षेत्र में भी बजट कई नई पहलें लेकर आया है। 100 नए मुख्यमंत्री स्कूल ऑफ़ एक्सीलेंस खोलने, कन्या आवासीय विद्यालयों की स्थापना और उच्च शिक्षा के विस्तार जैसे निर्णय भविष्य की मानव पूंजी के निर्माण पर केंद्रित हैं। चतरा में प्रस्तावित अंबेडकर विश्वविद्यालय सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम है।स्वास्थ्य और आवास के मोर्चे पर सरकार ने ठोस घोषणाएँ की हैं। अबुआ आवास योजना के तहत लाखों परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराने का लक्ष्य, 750 अबुआ दवाखानों की स्थापना, और कैंसर उपचार के लिए विशेष बजटीय प्रावधान यह दर्शाते हैं कि सरकार स्वास्थ्य सुरक्षा और जीवन-स्तर सुधार को प्राथमिकता दे रही है।ग्रामीण बुनियादी ढाँचे सड़क, पेयजल और बिजली पर ज़ोर यह स्वीकार करता है कि झारखंड की सामाजिक स्थिरता ग्रामीण विकास से जुड़ी है। आजीविका सृजन और कृषि आधारित पहलों के माध्यम से सरकार पलायन और असमानता जैसी पुरानी समस्याओं से निपटने का प्रयास कर रही है।हालाँकि, बजट भाषण में केंद्र से अपेक्षित वित्तीय सहयोग न मिलने का उल्लेख यह सवाल भी उठाता है कि क्या राज्यों को उनकी बढ़ती कल्याणकारी ज़िम्मेदारियों के अनुरूप पर्याप्त संसाधन मिल रहे हैं। यह बहस केवल झारखंड तक सीमित नहीं, बल्कि भारतीय संघीय ढाँचे की व्यापक चुनौती को उजागर करती है। कुल मिलाकर, झारखंड का 2026 का बजट यह संदेश देता है कि विकास की परिभाषा अब केवल अवसंरचना या औद्योगिक निवेश तक सीमित नहीं है। सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तीकरण को केंद्र में रखकर यह बजट कल्याण और विकास के बीच की पारंपरिक रेखा को धुंधला करता है। अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि ये पहलकदमियाँ काग़ज़ से ज़मीन तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुँच पाती हैं।
