Eksandeshlive Desk
काठमांडू : नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के रविवार को प्रतिनिधि सभा में नेपाल-भारत सीमा विवाद के संबंध में दिए गए बयान को लेकर विपक्षी दल एकजुट हो गए हैं। सोमवार को हुई विपक्षी दलों की बैठक में कहा गया कि प्रधानमंत्री को अपनी टिप्पणी वापस लेते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। बैठक के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) के प्रमुख युवराज दुलाल ने कहा कि विपक्षी दलों ने निर्णय लिया है कि जब तक प्रधानमंत्री माफी नहीं मांगते, तब तक संसद की कार्यवाही चलने नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों की बैठक ने निष्कर्ष निकाला है कि प्रधानमंत्री माफी नहीं मांगते तब तक सदन नहीं चलने दिया जाएगा। इसी तरह नेपाली कांग्रेस संसदीय दल के मुख्य सचेतक निष्कल राई ने बताया कि बैठक ने प्रधानमंत्री के सीमा अतिक्रमण संबंधी बयान को राष्ट्रघाती करार दिया है। विपक्षी दलों ने मांग की है कि उक्त टिप्पणी को संसद की कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटाया जाए और प्रधानमंत्री स्वयं संसद में खड़े होकर देशवासियों से माफी मांगें। उन्होंने कहा कि इन मांगों के पूरा होने तक विपक्ष संसद का अवरोध जारी रखेगा। राई ने कहा कि प्रधानमंत्री ने सीमा अतिक्रमण के विषय में संसद में जो अभिव्यक्ति दी, उसे विपक्षी दलों ने राष्ट्रघाती माना है। हमारी मांग है कि इस बयान को संसद के रिकॉर्ड से हटाया जाए और प्रधानमंत्री संसद से ही देशवासियों के नाम माफी मांगें। विपक्षी दलों का कहना है कि प्रधानमंत्री का बयान नेपाल के राष्ट्रीय हित और सीमा संबंधी आधिकारिक नीति के विपरीत है, इसलिए सरकार को इस पर तत्काल स्पष्टीकरण देना चाहिए।
पीएम बालेंद्र के भारत के साथ भूमि विवाद वाले बयान पर विदेश मंत्रालय की सफाई : इस बीच नेपाल के विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के उस बयान पर सफाई दी है, जिसमें उन्होंने भारत की भूमि पर नेपाल का अतिक्रमण बताया था। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि उनकी यह टिप्पणी ‘सीमा पार भूमि उपयोग’ (क्रॉस-बॉर्डर ऑक्युपेशन) की तकनीकी अवधारणा से जुड़ी हुई थी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर पौडेल क्षेत्री ने सोमवार को एक बयान में कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी सीमा स्तंभों, दशगजा (नो-मैन्स लैंड) और सीमा पार भूमि उपयोग से संबंधित मुद्दों की ओर संकेत करती है। उन्होंने बताया कि तकनीकी अध्ययनों के आधार पर ऐसे कुछ क्षेत्र हैं, जहां नेपाल द्वारा उपयोग की जा रही भूमि भारतीय क्षेत्र में पड़ सकती है। इसी प्रकार कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं, जहां भारत द्वारा उपयोग की जा रही भूमि नेपाल की सीमा के भीतर हो सकती है। प्रवक्ता ने कहा कि यह मुख्य रूप से नो-मैन्स लैंड पर अतिक्रमण और सीमा पार भूमि उपयोग से संबंधित विषय है, जिसका अर्थ है कि सीमा के आर-पार भूमि का उपयोग किया जाना। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि नेपाल की आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण सुगौली संधि के आधार पर किया गया है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा, कालापानी और सुस्ता जैसे क्षेत्रों का सीमांकन अभी भी पूरी तरह से संपन्न नहीं हुआ है। बयान के अनुसार नदी आधारित सीमाओं और नदियों के बहाव मार्ग में समय-समय पर होने वाले बदलावों के कारण ऐसी स्थितियां उत्पन्न हुई हैं, जहां एक देश के नागरिक दूसरे देश की सीमा के भीतर आने वाली भूमि का उपयोग कर रहे हैं। मंत्रालय ने बताया कि नेपाल और भारत के तकनीकी दल सीमा स्तंभों की मरम्मत, नो-मैन्स लैंड में अतिक्रमण की निगरानी तथा सीमा पार भूमि उपयोग से संबंधित आंकड़े एकत्र करने जैसे कार्यों में लगे हुए हैं। नेपाल की आधिकारिक स्थिति को दोहराते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि सरकार ऐतिहासिक संधियों, मानचित्रों और द्विपक्षीय समझौतों के आधार पर कूटनीतिक संवाद के माध्यम से सभी सीमा विवादों का समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि, भारत सरकार की ओर से अभी तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
नेपाल के प्रधानमंत्री के बयान की छात्र संगठनों ने निंदा की, माफी की मांग : नेपाल के 10 छात्र संगठनों ने संयुक्त रूप से प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के सीमा संबंधी मुद्दे पर रविवार को संसद में दिए बयान की कड़ी निंदा की है और उनसे तत्काल बयान वापस लेने और सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है। अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र विद्यार्थी यूनियन, अखिल (समाजवादी), अखिल (छठौं), अनेरास्ववियु (क्रांतिकारी), वैज्ञानिक समाजवादी विद्यार्थी संगठन नेपाल, जनपक्षीय विद्यार्थी यूनियन नेपाल सहित विभिन्न छात्र संगठनों के नेताओं ने सोमवार को एक संयुक्त बयान में प्रधानमंत्री की टिप्पणी को राष्ट्रविरोधी, आत्मसमर्पणवादी और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया है। छात्र संगठनों ने कहा कि ऐसे समय में यह बयान आना बेहद चिंताजनक है, जब नेपाल लगातार यह दावा करता रहा है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा सहित उसके कुछ क्षेत्र भारतीय कब्जे में हैं। बयान में कहा गया है कि नेपाल की संप्रभुता, स्वतंत्रता और भौगोलिक अखंडता को कमजोर करने वाली किसी भी टिप्पणी को स्वीकार नहीं किया जा सकता और इसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए। छात्र नेताओं ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री के बयान को केवल एक साधारण भूल नहीं माना जा सकता, बल्कि यह राष्ट्रीय हितों के विपरीत एक राजनीतिक सोच को दर्शाता है। छात्र संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों की अनदेखी की गई तो देशभर के छात्र, युवा और राष्ट्रभक्त नागरिक राष्ट्रीय संप्रभुता और हितों के खिलाफ बताए गए कदमों के विरोध में और सशक्त आंदोलन शुरू करेंगे। छात्र संगठनों का यह संयुक्त बयान ऐसे समय में आया है जब नेपाल-भारत सीमा विवाद को लेकर संसद में प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए वक्तव्य पर राजनीतिक दलों, संवैधानिक विशेषज्ञों और नागरिक समाज के विभिन्न वर्गों की ओर से लगातार आलोचना हो रही है।उल्लेखनीय है कि बालेंद्र शाह ने रविवार को संसद में कहा था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें पता चला कि न सिर्फ भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा किया है।
