Eksandeshlive Desk
धनबाद : सबके दिलों पर राज करने वाले असम (गुवाहाटी) निवासी महान संगीतकार जुबिन गर्ग को श्रद्धांजलि देने के लिए ‘झारखंड बंगला भाषा संस्कृति परिषद’ का एक प्रतिनिधिमंडल उनके आवास पहुंचा। वहां परिषद के सदस्यों ने जुबिन गर्ग के पिता, प्रख्यात कवि व साहित्यकार कपिल बर ठाकुर को परिषद का स्मृति चिह्न (मोमेंटो) और असम का पवित्र ‘गमोछा’ (गमछी) सौंपकर जुबिन दा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। सदस्यों ने उनके पिता के साथ जुबिन दा के जीवन और संगीत यात्रा पर घंटों चर्चा की। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने उनके समाधि स्थल का भी दौरा किया। इस मौके पर परिषद के अध्यक्ष अजय मुखर्जी, सदस्य लूना मुखर्जी, सहायक प्रोफेसर डॉ. चंदन कुमार गोस्वामी, सुमिता देवी चौधरी और चंद्राकी गोस्वामी सहित कई अन्य लोग उपस्थित थे।
संगीत जगत में जुबिन दा का योगदान अपूरणीय: अजय मुखर्जी (अध्यक्ष): “जुबिन दा जैसे महान संगीतकार को श्रद्धांजलि देकर परिषद खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है। उनका संगीत हमेशा जीवित रहेगा।” समीर गोस्वामी (सचिव): “संगीत जगत में जुबिन दा का योगदान अतुलनीय और अपूरणीय है। उनकी अनोखी आवाज ने हर पीढ़ी का दिल जीता है।” मिताली मुखर्जी (संयुक्त सचिव): “जुबिन दा के संगीत में एक ऐसा अनूठा मीठापन है, जिसने पूरी दुनिया को उनका दीवाना बना दिया।” जुबिन गर्ग की पत्नी गरिमा सैकिया गर्ग ने प्रतिनिधिमंडल से बातचीत में बताया कि जुबिन ने 52 साल की उम्र में 40 अलग-अलग भाषाओं में लगभग 40 हजार गाने गाए। उन्होंने सिर्फ गाने ही नहीं गाए, बल्कि हजारों कविताएं और गीत लिखे, फिल्में बनाईं और समाज सेवा के क्षेत्र में कई अनुकरणीय काम किए।
श्रद्धांजलि में बंद रहीं दुकानें, मस्जिदों में बजे गाने : 6 दिवसीय राज्यस्तरीय शोक: गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर डॉ. चंदन कुमार गोस्वामी ने बताया कि जुबिन दा के सम्मान में 6 दिनों का राज्यस्तरीय शोक मनाया गया था। सभी दुकानें बंद रहे । यंहा तक की इस दौरान मछली और सब्जी विक्रेताओं ने भी स्वेच्छा से अपनी दुकानें बंद रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
मस्जिदों में जले दीप: स्थानीय युवा मैदुल हक ने बताया कि जुबिन दा के सम्मान में मस्जिदों में भी उनके गाने बजते रहे और दीप जलाए गए, जो कि अमूमन मस्जिदों में नहीं होता है। यह उनकी सर्वधर्म स्वीकार्यता को दर्शाता है। पर्यावरण के प्रति प्रेम: सुमिता देवी चौधरी ने बताया कि जुबिन दा को पर्यावरण से गहरा लगाव था। उन्होंने सिर्फ असम या गुवाहाटी में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी हजारों पौधे लगाए थे।
