चतरा: 350 साल पुराने लेंबोईया राजगढ़ पर संकट, झाड़ियों में गुम हो रही ऐतिहासिक विरासत

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राजपरिवार की वीरता, मां भगवती के प्रति आस्था और कई लोककथाएं समेटे है ऐतिहासिक स्थल

Eksandeshlive Desk

चतरा: इतिहास केवल किताबों और अभिलेखों में दर्ज घटनाओं का नाम नहीं है, बल्कि वह उन इमारतों, किलों, गढ़ों और पुरावशेषों में भी जीवित रहता है, जो किसी दौर की वीरता, समृद्धि, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था की कहानी बयां करते हैं। झारखंड के चतरा जिले के पत्थलगडा प्रखंड अंतर्गत सिंघानी और लेंबोईया गांव की सीमा पर स्थित करीब 350 साल पुराना लेंबोईया राजा गढ़ भी ऐसी ही ऐतिहासिक विरासत है। कभी जागीरदारी व्यवस्था की समृद्धि और सामरिक शक्ति का प्रतीक रहा यह राजगढ़ आज उपेक्षा और संरक्षण के अभाव में अपना अस्तित्व खोने की कगार पर है। जिस स्थान पर कभी राजपरिवार की गतिविधियां होती थीं, जहां से बड़े भूभाग की जागीरदारी का संचालन होता था, वहां आज झाड़ियां उग आई हैं। गढ़ के अवशेष मिट्टी और वनस्पतियों के बीच बिखरे पड़े हैं। पुराने ईंट-पत्थर, मिट्टी के बर्तन और अन्य पुरावशेष इस बात की गवाही देते हैं कि यह इलाका कभी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा। स्थानीय इतिहास और लोकमान्यताओं के अनुसार, लेंबोईया राजगढ़ का संबंध रामगढ़ राजपरिवार की जागीरदारी व्यवस्था से रहा है। मुगलकालीन संघर्षों में बादम के राजा की रक्षा करने वाले तीन सगे भाइयों की वीरता के बदले उन्हें 52 मौजा की जागीरदारी प्रदान की गई थी। उन्हीं भाइयों के वंशजों में से शिवदत्त राय का लेंबोईया क्षेत्र से संबंध बताया जाता है। हालांकि, आज इस ऐतिहासिक स्थल की पहचान धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही है। न यहां कोई व्यवस्थित सूचना पट्ट है और न ही इसके ऐतिहासिक महत्व को सुरक्षित रखने के लिए कोई ठोस संरक्षण व्यवस्था दिखाई देती है।

मुगलों के चंगुल से राजा को बचाने पर मिली थी 52 मौजा की जागीरदारी: पत्रकार शिवकुमार सिंह के अनुसार, लेंबोईया स्थित राजगढ़ जागीरदार शिवदत्त राय का गढ़ हुआ करता था। स्थानीय लोक इतिहास के मुताबिक छगोशी राय, बालकृष्ण राय और शिवदत्त राय तीन सगे भाई थे। इन तीनों भाइयों की वीरता की कहानी क्षेत्र में आज भी सुनाई जाती है। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में जब बादम के राजा हेमंत सिंह को मुगल सैनिक बंदी बनाकर कुंदा की ओर ले जा रहे थे, तब तीनों भाइयों ने उन्हें छुड़ाने के लिए साहसिक प्रयास किया था। लोकमान्यता के अनुसार, सबसे पहले कटिया मुरबे के समीप मुगल सैनिकों से उनका सामना हुआ। इसके बाद जोरी के निकट सरदम में भी संघर्ष हुआ। तीनों भाइयों ने अदम्य साहस दिखाते हुए राजा को मुगल सैनिकों के कब्जे से सुरक्षित छुड़ा लिया और उन्हें वापस बादम पहुंचाया। इस साहसिक कार्य से प्रसन्न होकर राजा ने तीनों भाइयों को 52 मौजा की खुटकट्टी जागीरदारी प्रदान की थी। बताया जाता है कि इस घटना का उल्लेख राजपंडित दामोदर मिश्र के अभिलेखों में भी मिलता है। स्थानीय इतिहास में यह प्रसंग तीनों भाइयों की वीरता और रामगढ़ राजपरिवार के साथ उनके संबंधों का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।

तीनों भाइयों के बीच हुआ था जागीरदारी का बंटवारा: ब्रह्मऋषि समाज के विमल सिंह, सेवानिवृत्त शिक्षक उदयनाथ सिंह, सुमेर सिंह सहित अन्य ने बताया कि उनके बुजुर्गों के अनुसार राजा से प्राप्त 52 मौजा की जागीरदारी बाद में तीनों भाइयों के बीच बांट दी गई। स्थानीय वंशावली और प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, छगोशी राय को सिमरिया पट्टी की जागीरदारी मिली, जबकि शिवदत्त राय के हिस्से में लेंबोईया पट्टी आई। वहीं बालकृष्ण राय के पुत्र जगूवीर राय के निःसंतान रहने के कारण उनका वंश आगे नहीं बढ़ सका। भूमिहार समाज की वंशावली में भी इस संबंध में विवरण होने की बात कही जाती है।तीनों भाइयों की वीरता से प्रभावित होकर राजा ने उन्हें सोने का खूंटा और सोने की तलवार भी भेंट की थी। स्थानीय मान्यता के अनुसार, सोने की तलवार आज भी जागीरदार परिवार के वंशजों के पास सुरक्षित है। यह तलवार केवल एक बहुमूल्य वस्तु नहीं, बल्कि उस दौर की वीरता और राजपरिवार से जुड़े गौरवशाली अतीत का प्रतीक मानी जाती है। हालांकि, इस ऐतिहासिक धरोहर के संबंध में दस्तावेजी प्रमाण और स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि की आवश्यकता है।

मां भगवती के अनन्य भक्त थे राजपरिवार के सदस्य: लेंबोईया राजगढ़ का इतिहास केवल युद्ध, वीरता और जागीरदारी तक सीमित नहीं है। इससे धार्मिक आस्था और स्थानीय संस्कृति की कई परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, राजपरिवार के सदस्य लेंबोईया पहाड़ी पर विराजमान मां भगवती के अनन्य भक्त थे। मान्यता है कि राजपरिवार ने ही पहाड़ी पर मां भगवती के मंदिर का निर्माण कराया था। आज भी यह मंदिर आसपास के गांवों के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। बताया जाता है कि मंदिर में पूजा-अर्चना और धार्मिक परंपराओं के संचालन के लिए राजपरिवार की ओर से पुजारियों को जमीन दान में दी गई थी, ताकि वे अपने परिवार के साथ रहकर धार्मिक कार्यों का निर्वहन कर सकें। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मुगल सैनिकों से संघर्ष के दौरान तीनों भाइयों ने मां भगवती से विजय का आशीर्वाद मांगा था। युद्ध में सफलता के बाद माता के प्रति उनकी श्रद्धा और गहरी हो गई। राजगढ़ और पहाड़ी पर स्थित मंदिर के बीच जुड़ी ये परंपराएं इस क्षेत्र की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को एक-दूसरे से जोड़ती हैं।

खेतों में आज भी मिलते हैं पुराने अवशेष, ग्रामीणों में तरह-तरह की मान्यताएं: सिंघानी गांव के बुजुर्ग पंडित भोली पांडे के अनुसार, पहले राजगढ़ के आसपास के खेतों में खुदाई और खेती के दौरान सोने के फाल सहित कई पुरानी वस्तुएं मिलती थीं। इलाके में यह मान्यता प्रचलित थी कि ऐसी वस्तुओं को घर ले जाने से संबंधित व्यक्ति को नुकसान उठाना पड़ता है। इसी डर और लोकविश्वास के कारण ग्रामीण इन वस्तुओं को अपने घर ले जाने से कतराते थे और उन्हें वहीं छोड़ देते थे। विधायक प्रतिनिधि बासुदेव दांगी के मुताबिक, पहले इस इलाके में खेती के दौरान पुराने समय की कई वस्तुएं दिखाई देती थीं। आज भी खेतों में पुराने अवशेष मिलने की बातें सामने आती रहती हैं। राजगढ़ के आसपास बिखरे पुराने ईंट-पत्थर, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े और अन्य पुरावशेष इस स्थल के पुरातात्विक महत्व की ओर संकेत करते हैं। हालांकि, इन वस्तुओं का वास्तविक कालखंड, उपयोग और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानने के लिए विशेषज्ञों की ओर से वैज्ञानिक सर्वेक्षण और अध्ययन जरूरी है।

प्राचीन कुआं भी है राजगढ़ की ऐतिहासिक पहचान: लेंबोईया राजगढ़ के समीप एक प्राचीन कुआं भी मौजूद है, जिसे ग्रामीणों ने सुरक्षा के दृष्टिकोण से ढक दिया है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह कुआं भी राजगढ़ के पुराने इतिहास का हिस्सा रहा होगा। उस दौर में किलों और गढ़ों के आसपास जलस्रोतों का विशेष महत्व होता था। पेयजल की व्यवस्था के साथ-साथ किसी भी बस्ती या गढ़ की सुरक्षा और दैनिक गतिविधियों के लिए कुएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। कुएं के आसपास पुराने ईंटों, मिट्टी के बर्तनों और अन्य अवशेषों का मिलना इस क्षेत्र में पुराने समय की बसावट की संभावना को मजबूत करता है। ग्रामीणों के अनुसार, पूरा इलाका कभी एक समृद्ध जागीरदारी व्यवस्था का गवाह रहा है। समय के साथ आबादी, खेती और अन्य गतिविधियों के विस्तार के बीच इस ऐतिहासिक स्थल की मूल संरचना प्रभावित होती चली गई। उचित देखरेख नहीं होने से इसके अवशेष धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं।

सर्वे खतियान और नक्शे में भी दर्ज है ऐतिहासिक स्थल: लेंबोईया राजगढ़ की एक महत्वपूर्ण बात यह भी बताई जाती है कि इसका उल्लेख सर्वे, खतियान और नक्शे में मौजूद है। ऐसे राजस्व अभिलेख किसी स्थान की ऐतिहासिक पहचान और उसकी भूमि संबंधी स्थिति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि राजस्व अभिलेखों, पुराने वंशावली दस्तावेजों और स्थानीय परंपराओं का समुचित अध्ययन किया जाए तो इस गढ़ के इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों की ओर से स्थल का सर्वेक्षण कराया जाना जरूरी है। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि गढ़ का वास्तविक विस्तार कितना था, यहां किस प्रकार की संरचनाएं मौजूद थीं और बिखरे पड़े अवशेष किस कालखंड से संबंधित हैं। साथ ही, राजपंडित दामोदर मिश्र के कथित अभिलेखों और भूमिहार समाज की वंशावली का अध्ययन कर स्थानीय इतिहास को प्रमाणिक आधार दिया जा सकता है।

संरक्षण हुआ तो पर्यटन और स्थानीय पहचान को मिलेगा नया आयाम: लेंबोईया राजा गढ़ केवल सिंघानी और लेंबोईया गांवों की ऐतिहासिक धरोहर नहीं है, बल्कि यह चतरा जिले की समृद्ध लोकस्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां की वीरता की कहानियां, 52 मौजा की जागीरदारी का इतिहास, मां भगवती मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराएं और खेतों में मिलने वाले पुरावशेष इस स्थल को विशिष्ट पहचान देते हैं। यदि इस स्थान का व्यवस्थित सर्वेक्षण कराकर सीमांकन किया जाए और बिखरे अवशेषों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जाए तो इसे ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विकसित किया जा सकता है। स्थल की साफ-सफाई, सूचना पट्ट की स्थापना, पुराने कुएं की सुरक्षा और उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों का संकलन इसके संरक्षण की दिशा में शुरुआती कदम हो सकते हैं। आगे चलकर इसे स्थानीय इतिहास और सांस्कृतिक पर्यटन के केंद्र के रूप में भी विकसित करने की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। आज जरूरत है कि जिला प्रशासन, पुरातत्व विभाग, इतिहासकार और स्थानीय समाज मिलकर इस विरासत को बचाने की पहल करें। अन्यथा जिस लेंबोईया राजगढ़ ने कभी वीरता, सत्ता और समृद्धि का इतिहास देखा था, उसके अवशेष भी धीरे-धीरे झाड़ियों और मिट्टी में समा जाएंगे। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह इतिहास केवल बुजुर्गों की जुबानी सुनाई जाने वाली लोककथा बनकर रह जाएगा।

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