ऐतिहासिक फैसला : झारखंड हाई कोर्ट का ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश

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रेप पीड़िताओं के बच्चों को मिलेगी मुफ्त शिक्षा-छात्रवृत्ति

Eksandeshlive Desk

रांची : झारखंड उच्च न्यायालय ने यौन हिंसा और बलात्कार पीड़िताओं के अधिकारों की सुरक्षा, त्वरित न्याय, पुनर्वास और मुआवजा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार, पुलिस प्रशासन, न्यायपालिका और संबंधित विभागों के लिए 19 अहम दिशा निर्देश जारी किए हैं। यह मामला यौन हिंसा पीड़िताओं की सुरक्षा, पुनर्वास और न्याय तक उनकी आसान पहुंच सुनिश्चित करने से संबंधित था। मामले में न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) के रूप में अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया ने अदालत को कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिन्हें न्यायालय ने अपने आदेश का हिस्सा बनाया।

उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में बलात्कार एवं यौन हिंसा पीड़िताओं के मेडिकल परीक्षण के दौरान किए जाने वाले ‘टू फिंगर टेस्ट’ पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश का उल्लंघन पेशेवर कदाचार माना जाएगा और दोषी व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। खंडपीठ ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 173 के तहत राज्यभर में जीरो एफआईआर की व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि इस व्यवस्था में लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय एवं दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही यौन अपराधों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए पुलिस अधिकारियों और कर्मियों के नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने का भी निर्देश दिया गया है। अदालत ने महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग को राज्य के सभी वन स्टॉप सेंटरों की कमियों को दूर करने तथा उनकी नियमित निगरानी के लिए महिलाओं की अध्यक्षता में समिति गठित करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा रांची स्थित नारी निकेतन (शक्ति सदन) को यौन हिंसा पीड़ित महिलाओं के लिए आश्रय गृह के रूप में उपयोग करने का आदेश दिया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वहां रहने की कोई अधिकतम समय सीमा निर्धारित नहीं होगी और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा। राज्य सरकार को सभी आश्रय गृहों और पुनर्वास केंद्रों की जानकारी व्यापक स्तर पर प्रचारित करने का भी निर्देश दिया गया है।

उच्च न्यायालय ने प्रत्येक जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया है, जो बलात्कार से जन्मे बच्चों की शिक्षा और कल्याण की निगरानी करेगा। ऐसे बच्चों को कक्षा 12 तक निशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अतिरिक्त, यदि कोई छात्र आईआईटी, एनआईटी, एम्स, आईआईएम या अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में चयनित होता है, तो उसे छात्रवृत्ति प्रदान करने की व्यवस्था सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट मुकदमे के शुरुआती चरण में ही अंतरिम राहत की आवश्यकता पर विचार करे। साथ ही अंतिम निर्णय के समय, चाहे आरोपित दोषी ठहराया जाए, बरी हो जाए या फरार हो, पीड़िता के लिए अंतिम मुआवजा निर्धारित करना अनिवार्य होगा। खंडपीठ ने निर्देश दिया कि स्वीकृत मुआवजा राशि का भुगतान 30 दिनों के भीतर किया जाए। उच्च न्यायालय ने बलात्कार मामलों की प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर और अंतिम जांच अधिकतम दो माह के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है। अदालतों को अनावश्यक स्थगन से बचने तथा बीएनएसएस की धारा 346 के तहत निर्धारित समयसीमा का कड़ाई से पालन करने को कहा गया है। साथ ही डीजीपी को एक विशेष टास्क फोर्स गठित करने का निर्देश दिया गया है, जो प्रत्येक तिमाही में यौन अपराधों से जुड़े मामलों की समीक्षा और निगरानी करेगी। अदालत ने कहा कि मीडिया, पुलिस और न्यायालय कर्मियों को पीड़िताओं की पहचान गोपनीय रखने संबंधी उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा। पहचान उजागर करने या गोपनीयता भंग करने वालों के खिलाफ कानूनी और विभागीय कार्रवाई की जाएगी। सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिया गया है कि पीड़िताओं को प्रशिक्षित अधिवक्ताओं के माध्यम से तत्काल कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए। वहीं पॉक्सो अधिनियम से जुड़े मामलों में 24 घंटे के भीतर आश्रय, सुरक्षा और चिकित्सीय सहायता सुनिश्चित की जाए।

उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरीन यह निर्देश दिया कि यौन अपराध पीड़िताओं का बयान केवल महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाए। साथ ही दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों के लिए कानूनी जागरूकता अभियान चलाने तथा स्कूलों, कॉलेजों और गांवों में निःशुल्क आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने को कहा गया है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि सामाजिक परिस्थितियों के कारण कोई पीड़िता या उसका परिवार स्थान परिवर्तन करना चाहता है, तो राज्य सरकार उनके पुनर्वास की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करे। इसके अलावा महिला हेल्पलाइन 181 को प्राथमिक हेल्पलाइन के रूप में विकसित करने और उसे आपातकालीन सेवा 112 से जोड़ने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करने का निर्देश भी राज्य सरकार को दिया गया है।

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