रांची: बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) के कुलपति डॉ एससी दुबे ने बुधवार को विश्वविद्यालय के पौधा रोग विज्ञान विभाग में अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त आणविक प्रयोगशाला का उद्घाटन किया।इस अवसर पर कुलपति ने कहा कि इस प्रयोगशाला की स्थापना पौधा रोग विज्ञान से संबंधित आणविक तकनीकों के व्यावहारिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देने तथा पौधों में होने वाले रोगों की सटीक पहचान और निदान को सुगम बनाने के उद्देश्य से की गई है। यह आधुनिक प्रयोगशाला आणविक अनुसंधान को सुदृढ़ करने, पादप रोगों के निदान में सुधार लाने तथा स्नातकोत्तर एवं पीएचडी के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों को उन्नत व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने में सहायक होगी। इस प्रयोगशाला से क्षेत्र विशेष में फसलों को प्रभावित करने वाले पौधा रोगों के बेहतर प्रबंधन एवं नियंत्रण में भी मदद मिलने की उम्मीद है। इससे फसलों के स्वास्थ्य और उत्पादकता में सुधार लाने में योगदान मिलेगा। यहां उपलब्ध सुविधाओं के माध्यम से विद्यार्थी और शोधार्थी पादप रोगजनकों तथा रोगों के विकास से संबंधित उन्नत अनुसंधान कर सकेंगे। आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता से शोध कार्यों की गुणवत्ता बेहतर होगी और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक शोध पत्रिकाओं में अनुसंधान निष्कर्षों के प्रकाशन को भी प्रोत्साहन मिलेगा। प्रयोगशाला में स्पेक्ट्रोफोटोमीटर, पॉलीमरेज चेन रिएक्शन (पीसीआर) प्रणाली, जेल डॉक्यूमेंटेशन सिस्टम, इलेक्ट्रोफोरेसिस उपकरण, रेफ्रिजरेटेड सेंट्रीफ्यूज, डीप फ्रीजर और नैनोड्रॉप उपकरण सहित कई आधुनिक यंत्र उपलब्ध कराए गए हैं। इन उपकरणों की मदद से जैविक नमूनों का विश्लेषण, आनुवंशिक पदार्थों का संवर्धन एवं परीक्षण तथा रोग उत्पन्न करने वाले जीवों की पहचान सहित आणविक जीव विज्ञान और पादप रोग विज्ञान से जुड़े विभिन्न कार्य किए जा सकेंगे। पौधा रोग विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ एचसी लाल ने कहा कि यह प्रयोगशाला पौधा रोग प्रबंधन के क्षेत्र में उन्नत अनुसंधान एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करेगी। इस सुविधा से विभाग की अनुसंधान क्षमताओं को मजबूती मिलेगी और विद्यार्थियों को आधुनिक रोग निदान तकनीकों में दक्षता हासिल करने का अवसर मिलेगा। प्रयोगशाला में आणविक तकनीकों के माध्यम से पादप रोगजनकों की पहचान एवं उनके लक्षणों का विश्लेषण किया जाएगा। विशेष रूप से महत्वपूर्ण कृषि एवं बागवानी फसलों में रोग उत्पन्न करने वाले रोगजनकों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इन अध्ययनों से रोगों के अधिक सटीक निदान में मदद मिलेगी तथा स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुकूल प्रभावी और किफायती रोग प्रबंधन उपायों के विकास को बढ़ावा मिलेगा।
