नेपाल : जेन जी आंदोलन की जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई नई सरकार के गठन के बाद

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Eksandeshlive Desk

काठमांडू : एक सप्ताह बाद यानी 27 मार्च को बालेन्द्र शाह को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाना तय हो चुका है। ऐसे में जेन जी आंदोलन की जांच प्रतिवेदन को लागू करना या सार्वजनिक करना अब उन्हीं की जिम्मेदारी होगी। अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की सरकार ने उक्त प्रतिवेदन को सार्वजनिक न करने का निर्णय लिया है। अंतरिम प्रधानमंत्री के प्रेस सलाहकार रामबहादुर रावल ने कहा कि वर्तमान सरकार अपने हिस्से का काम पूरा कर चुकी है। उन्होंने कहा, “इस सरकार ने प्रतिवेदन को आगे बढ़ा दिया है, बाकी काम आने वाली सरकार पूरा करेगी।” रविवार को हुई मंत्रिपरिषद बैठक ने जांच आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करने का निर्णय लिया था। हालांकि, रिपोर्ट स्वीकार करने के बाद भी आगे की कोई प्रक्रिया नहीं बढ़ाई गई है। नेपाल सरकार के मुख्य सचिव सुमनराज अर्याल ने कहा, “प्रतिवेदन स्वीकार कर लिया गया है, इसके अलावा कुछ भी नहीं हुआ है। इसे सार्वजनिक करना है या नहीं, यह निर्णय कैबिनेट का होता है। जांच आयोग गठित कर रिपोर्ट सार्वजनिक करने और उसे लागू करने का वादा करने वाली सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली सरकार अब विदाई के चरण में है। इस सरकार ने रिपोर्ट के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी निर्वाचित सरकार को सौंप दी है। रिपोर्ट स्वीकार करने के एक सप्ताह बाद भी न तो पूर्व घोषणा के अनुसार इसे सार्वजनिक किया गया है और न ही कार्यान्वयन के लिए संबंधित निकायों को भेजा गया है। फिलहाल रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय में ही रखी हुई है। रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और लागू करने की मांग जेन जी आंदोलन के नेताओं द्वारा लगातार की जा रही है। जेन जी की अगुवा रक्षा बम ने सुशीला कार्की से अपील की है कि वह रिपोर्ट सार्वजनिक करें और 8 और 9 सितंबर 2025 को हुई घटनाओं में संलिप्तता स्पष्ट करें। सोशल मीडिया के माध्यम से उन्होंने कहा कि रिपोर्ट सार्वजनिक न होने से उन पर भी सवाल उठ रहे हैं, इसलिए इन प्रश्नों का जवाब देने के लिए रिपोर्ट को सार्वजनिक करना आवश्यक है।

नेपाल मंत्रिमंडल गठन को लेकर मंथन तेज, प्रमुख पदों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सरकार गठन से पहले अपने मंत्रिमंडल को अंतिम रूप देने के लिए आंतरिक मूल्यांकन कर रही है। पार्टी अध्यक्ष रवि लामिछाने और वरिष्ठ नेता बालेन्द्र शाह के गुटों के नेता संभावित उम्मीदवारों की आपसी जांच-पड़ताल कर रहे हैं।नेपाल के संसदीय चुनाव में भारी जनादेश हासिल करने वाली पार्टी अब मंत्रियों, स्पीकर, मुख्य सचेतक और संसदीय समिति के अध्यक्ष पदों पर नियुक्तियों को लेकर विचार-विमर्श कर रही है। वित्त मंत्रालय के लिए अर्थविद डॉ. स्वर्णिम वाग्ले का नाम लगभग तय माना जा रहा है, जबकि अन्य प्रमुख मंत्रालयों पर निर्णय अभी लंबित है। मंत्रिस्तरीय और संसदीय पदों के लिए 50 से अधिक दावेदार मैदान में हैं, जिससे चयन प्रक्रिया काफी प्रतिस्पर्धी बन गई है। पार्टी के शीर्ष नेताओं के मुताबिक बालेन्द्र शाह लगभग 18 सदस्यों का अपेक्षाकृत छोटा मंत्रिमंडल बनाने की योजना में हैं, जबकि संविधान के अनुसार राज्य मंत्रियों सहित अधिकतम 25 सदस्य बनाए जा सकते हैं। गृह और विदेश जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के लिए कई दावेदार सामने आए हैं, जिससे सहमति बनाना और कठिन हो गया है। दोनों गुटों के नेता एक-दूसरे के प्रस्तावित नामों की जांच कर रहे हैं। बालेन गुट के सुझाए गए नामों की समीक्षा लामिछाने के करीबी कर रहे हैं, वहीं लामिछाने गुट के उम्मीदवारों की जांच बालेन के सचिवालय द्वारा की जा रही है। हाल ही में लामिछाने, शाह, वाग्ले और उपाध्यक्ष डीपी अर्याल के बीच हुई बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि मंत्रिमंडल के सदस्य पारदर्शी, सक्षम और विवादमुक्त होने चाहिए। पार्टी नेताओं के अनुसार चयन प्रक्रिया में उम्मीदवारों की पेशेवर योग्यता के साथ-साथ उनकी सार्वजनिक और व्यक्तिगत पृष्ठभूमि की भी जांच की जा रही है। पार्टी प्रवक्ता मनीष झा ने कहा, “हम दोनों पक्षों से आए 50 से अधिक नामों का अलग-अलग मूल्यांकन कर रहे हैं। लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि चुने गए लोग सक्षम, साफ-सुथरी छवि वाले और किसी स्वार्थ से प्रभावित न हों।” पार्टी ने यह भी जोर दिया है कि संबंधित मंत्रालयों में विषय विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाए, यानी ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी जाए जिनके पास अपने क्षेत्र में शैक्षणिक या पेशेवर विशेषज्ञता हो। सह-महासचिव बिपिन आचार्य ने कहा कि पार्टी योग्य और विश्वसनीय व्यक्तियों के चयन के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा, “हमारे पास कई सक्षम नेता हैं, उनमें से सर्वश्रेष्ठ को चुनना एक सकारात्मक चुनौती है।”

नेपाल में बालेन्द्र की पहली कैबिनेट बैठक में 1170 राजनीतिक नियुक्तियों को रद्द करने की तैयारी

बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में बनने वाली सरकार ने राज्य के विभिन्न निकायों में की गई कुल 1,170 राजनीतिक नियुक्तियों को एक साथ रद्द करने की तैयारी शुरू कर दी है। प्रशासनिक तंत्र में सुधार लाने की योजना के तहत सरकार गठन के तुरंत बाद शाह का पहला कदम पिछले शासनकाल में की गई नियुक्तियों को रद्द करना होगा। राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के वरिष्ठ नेता शाह 27 मार्च को प्रधानमंत्री पद के लिए शपथग्रहण करने वाले हैं। उसी दिन वे मंत्रिमंडल गठन करने की तैयारी में हैं। संवैधानिक निकायों, सार्वजनिक संस्थानों, कूटनीतिक मिशनों और विभिन्न बोर्डों में राजनीतिक आधार पर नियुक्तियां होती रही हैं। इन सबका विवरण एकत्र किया जा रहा है। पार्टी के केंद्रीय सदस्य एवं सांसद पुकार बम के अनुसार, शाह के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद होने वाली मंत्रिपरिषद की पहली बैठक में ही इस विषय पर निर्णय लिया जाएगा। पार्टी प्रवक्ता मनीष झा के अनुसार, नई सरकार बनने से पहले ही ऐसे पदों पर बैठे लोगों से नैतिक आधार पर स्वेच्छा से इस्तीफा देने का आग्रह किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि राज्य तंत्र को “कार्यकर्ता भर्ती केंद्र” बनने से रोकने के अभियान का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि केवल कार्यकर्ताओं के पालन-पोषण के उद्देश्य से की गई नियुक्तियों को रद्द किया जाएगा। उनका कहना है, “यदि किसी व्यक्ति की राजनीतिक पृष्ठभूमि है लेकिन वह सक्षम है, तो उसकी नियुक्ति उचित हो सकती है। लेकिन केवल अनावश्यक रूप से कार्यकर्ताओं को लाभ पहुँचाने के लिए राज्य पर बोझ डालने वाली नियुक्तियों को समाप्त किया जाएगा। सरकार में आने के बाद इनका पुनरावलोकन किया जाएगा।” झा के अनुसार, ऐसी नियुक्तियों की संख्या 1,170 है। उन्होंने यह भी कहा, “कुछ आयोग और निकाय तो हमें आवश्यक ही नहीं लगते, वे करदाताओं के पैसे पर बोझ मात्र हैं। अगर संबंधित लोग अभी स्वेच्छा से पद छोड़ दें तो बेहतर होगा।” फिलहाल पार्टी ने यह सार्वजनिक नहीं किया है कि किन-किन निकायों या पदों को खाली कराया जाएगा। नेताओं के अनुसार, इस विषय पर अभी और चर्चा व तैयारी बाकी है, इसलिए नाम तुरंत सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे। कुछ मामलों में केवल पदाधिकारी बदलने के बजाय पद या संस्थान को ही समाप्त किया जा सकता है। जेन-जी आंदोलन के बाद हुए चुनाव में लगभग दो-तिहाई जनमत प्राप्त कर सरकार बनाने की तैयारी में जुटी पार्टी ने सत्ता में आते ही लोकप्रिय कदम उठाने की योजना बनाई है। जनता को स्पष्ट रूप से दिखने वाले कार्यों के लिए बालेन्द्र शाह ने विभिन्न नियुक्तियों की समीक्षा और निरस्तीकरण को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है। इस कदम से संवैधानिक निकायों से लेकर सरकारी संस्थानों तक के प्रमुख और सदस्य सीधे प्रभावित हो सकते हैं। नेपाल में एंटी करप्शन ब्यूरो, लोक सेवा आयोग, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग और निर्वाचन आयोग जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक निकाय हैं जहां राजनीतिक नियुक्तियां होती आई हैं। इसके अलावा नेपाल राष्ट्र बैंक के गवर्नर, विभिन्न सरकारी संस्थानों के अध्यक्ष व सदस्य, भाषा आयोग, दलित आयोग, मुस्लिम आयोग, महिला आयोग और अन्य परिषदों में राजनीतिक भागीदारी के आधार पर नियुक्त लोगों को पद छोड़ने के लिए कहा गया है।

नेपाल की नई संसद में 30 से अधिक महत्वपूर्ण विधेयकों की विधायी प्रक्रिया फिर से होगी शुरू

प्रतिनिधि सभा के विघटन के बाद संघीय सिविल सेवा, नेपाल पुलिस और स्कूल शिक्षा सहित करीब 30 महत्वपूर्ण विधेयक निष्क्रिय हो गए हैं, जिससे आने वाली संसद में विधायी प्रक्रिया फिर से शुरू करनी पड़ेगी। ये विधेयक पहले संसदीय समितियों में गहन चर्चा के बाद आगे बढ़ चुके थे, लेकिन सितंबर 2025 में जेन-ज़ी आंदोलन के बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट के कारण संसद भंग होने पर ये स्वतः निष्क्रिय हो गए। संघीय संसद सचिवालय के प्रवक्ता एकराम गिरी के अनुसार प्रतिनिधि सभा भंग होने के बाद कुल 31 विधेयक निष्क्रिय हो गए। कानूनी प्रावधानों के अनुसार, प्रतिनिधि सभा में पेश किए गए विधेयक या राष्ट्रीय सभा से पारित होकर निचले सदन में लंबित विधेयक सदन के विघटन के साथ ही स्वतः समाप्त हो जाते हैं। हालांकि, राष्ट्रीय सभा में उत्पन्न और वहीं लंबित पांच विधेयक अभी भी सक्रिय हैं। इसके अलावा तीन विधेयक जो उच्च सदन से पारित हो चुके थे, विघटन से पहले निचले सदन को भेजे जा चुके थे। राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी को मिले स्पष्ट बहुमत के कारण नए राजनीतिक परिदृश्य में लंबे समय से लंबित इन विधेयकों को पारित करना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है। 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 182 सीटें हासिल करने के बाद यह पार्टी न केवल सदन में, बल्कि संसदीय समितियों में भी निर्णायक प्रभाव रखने की स्थिति में है। अंतरिम सरकार द्वारा वैकल्पिक वित्तीय प्रबंधन से संबंधित एक विधेयक भी पंजीकृत किया गया है, जबकि राष्ट्रीय सभा के पिछले सत्र में लाए गए तीन अध्यादेश नए संसद में विधायी कार्य के रूप में प्रस्तुत किए जाने की संभावना है।

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