Reporting by Mustaffa & Edit Sunil
मेसरा (रांची): कहते हैं कि अगर हौसलों में उड़ान हो,तो बंदिशों के सारे आसमान छोटे पड़ जाते हैं। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है झारखंड के बोकारो जिले के एक छोटे से गांव कुम्हारडीह की बेटी श्वेता श्री ने। श्वेता ने अपनी कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर आज वह मुकाम हासिल किया है,जो पूरे राज्य के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय बन चुका है। गत 17 मई 2026 को श्वेता श्री को अमेरिका के विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय,यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय अर्बाना-शैंपेन (यूआईयूसी) से पीएचडी की मानद उपाधि प्रदान की गई। वह अपने विस्तृत परिवार और आसपास के क्षेत्र की पहली ऐसी लड़की हैं, जिन्होंने डॉक्टरेट की सर्वोच्च शैक्षणिक डिग्री प्राप्त की है। अंधेरे को चीरकर निकली कामयाबी: श्वेता का बचपन एक ऐसे गांव में बीता जहां सालों तक बिजली जैसी बुनियादी सुविधा भी नहीं थी। लेकिन उनकी दादी शकुंतला देवी (जो पंचायत कन्या विद्यालय चलाती थीं) और दादा दुर्गा प्रसाद साहू ने उनके मन में यह बात बैठाई कि शिक्षा ही जीवन बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है। गोल्ड मेडलिस्ट से यूनिवर्सिटी टॉपर: उच्च शिक्षा के लिए श्वेता रांची आईं,जहां उन्होंने बीआईटी मेसरा से बायोटेक्नोलॉजी में स्नातक किया और गोल्ड मेडल हासिल किया। इसी प्रतिभा के दम पर उन्हें स्कॉलरशिप मिली,जिससे उन्होंने टेक्सास ए एंड एम यूनिवर्सिटी से मास्टर्स किया,जहाँ वे यूनिवर्सिटी टॉपर रहीं। रिकॉर्ड समय में शोध: श्वेता ने मात्र चार वर्षों के रिकॉर्ड समय में अपनी पीएचडी पूरी की है। उनका शोध विषय मॉलिक्यूलर मेकैनिज्म्स ऑफ केआरएएस 4बी सिगनलिंग है,जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के सूक्ष्म जैविक संकेतों को समझने पर आधारित है। उनके गाइड प्रोफेसर स्लाइडर अमेरिका की प्रतिष्ठित नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के सदस्य हैं। मामा और माता-पिता का संबल: श्वेता अपनी इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता-लीलावती साहू व डॉ. ओम प्रकाश साहू और अपने मामा व रांची (ओरमांझी) के पूर्व प्रमुख जय गोविंद उर्फ लालू साहू को देती हैं। लालू साहू और उनका पूरा परिवार अपनी भांजी की इस ग्लोबल कामयाबी पर बेहद गदगद है। श्वेता के पिता हमेशा कहते थे,जब बेटियां आगे बढ़ती हैं तो पूरा समाज आगे बढ़ता है। अंतिम व्यक्ति तक राहत पहुंचाना लक्ष्य: भविष्य में श्वेता का लक्ष्य फार्मास्युटिकल उद्योग में अनुभव प्राप्त कर कैंसर की सस्ती और सुलभ दवाएं विकसित करना है। उनका सपना एक कैंसर-मुक्त भारत का है,जहाँ इलाज के खर्च के कारण कोई गरीब न हो। श्वेता कहती हैं,विज्ञान का असली उद्देश्य केवल शोधपत्र प्रकाशित करना नहीं,बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक राहत पहुंचाना है। गांव में नई उम्मीद: जिस गांव में कभी बेटियों की उच्च शिक्षा सिर्फ एक सपना मानी जाती थी,आज वहां के बच्चे श्वेता की कहानी सुनकर अपनी आंखों में बड़े सपने सजाने लगे हैं। ग्रामीण गर्व से कह रहे हैं कि कुम्हारडीह की बेटी आज दुनिया के वैज्ञानिक मंच पर झारखंड का नाम रोशन कर रही है।
