भारत ने जैव विविधता अनुसंधान में रचा इतिहास, जेडएसआई ने तितलियों और पतंगों की पहली राष्ट्रीय सूची पूरी की

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Eksandeshlive Desk

कोलकाता : भारत ने जैव विविधता और वर्गिकी के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन कार्यरत जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जेडएसआई) ने देश की तितलियों और पतंगों का पहला राष्ट्रीय कैटलॉग तैयार करने की घोषणा की है। इससे भारत उन चुनिंदा जैव विविधता संपन्न देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जिनके पास इन जीवों का अद्यतन और प्रमाणिक राष्ट्रीय अभिलेख उपलब्ध है। यह परियोजना जेडएसआई के वैज्ञानिक डॉ. नवनीत सिंह और डॉ. राहुल जोशी के नेतृत्व में 12 वर्षों की निरंतर मेहनत के बाद पूरी हुई। इस दौरान देशभर में व्यापक क्षेत्रीय सर्वेक्षण, संग्रहालयों में संरक्षित नमूनों का अध्ययन तथा वैज्ञानिक साहित्य का गहन सत्यापन किया गया। इस श्रृंखला का अंतिम और निर्णायक खंड प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका जूटाक्सा में प्रकाशित हुआ है।

जेडएसआई के अनुसार, यह परियोजना पिछले एक शताब्दी से अधिक समय से मौजूद वर्गिकी संबंधी कमियों को दूर करती है और भविष्य में जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिकी अध्ययन तथा जलवायु परिवर्तन से जुड़े अनुसंधानों के लिए आधारभूत दस्तावेज का काम करेगी। कैटलॉग के अनुसार, भारत में तितलियों और पतंगों की 13 हजार 703 प्रजातियां पाई जाती हैं। ये तीन हजार 705 वंश, 240 उपकुल, 102 कुल और 31 महाकुल में वर्गीकृत हैं। दुनिया में ज्ञात तितलियों और पतंगों की कुल प्रजातियों का लगभग 8.25 प्रतिशत भारत में पाया जाता है। अंतिम प्रकाशित खंड में शेष 1689 प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया है, जिससे पहले से अनसुलझे कई वर्गिकी संबंधी प्रश्नों का समाधान हो गया है। जेडएसआई ने गुरुवार को बताया कि भारत जियोमेट्रोइडिया समूह की पतंगों के लिए भी वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। देश में इस समूह की दो हजार 205 प्रजातियां, 479 वंश, 13 उपकुल और चार कुल पाए जाते हैं, जो विश्व में ज्ञात जियोमेट्रोइडिया प्रजातियों का लगभग 8.80 प्रतिशत है। इनमें सबसे बड़ा कुल जियोमेट्रिडी है, जिसकी 2100 प्रजातियां दर्ज की गई हैं। इसके अलावा यूरानिडी की 95, एपिकोपिडी की 9 और स्यूडोबिस्टोनिडी की एक प्रजाति भारत में पाई जाती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार तितलियां और पतंगे पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये परागण, खाद्य श्रृंखला, जैविक अपघटन तथा कृषि और वानिकी से जुड़े पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट के वर्षावनों तक फैले भारत के विविध प्राकृतिक क्षेत्र इन प्रजातियों के संरक्षण के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं।जेडएसआई की निदेशक डॉ. धृति बनर्जी ने कहा कि यह कैटलॉग देश की जैव विविधता, पारिस्थितिकी निगरानी और वैश्विक संरक्षण प्रयासों के लिए अमूल्य राष्ट्रीय धरोहर साबित होगा। उनके अनुसार इस तरह के वैज्ञानिक दस्तावेज प्रजातियों को स्पष्ट वैज्ञानिक पहचान प्रदान करते हैं और संरक्षण संबंधी नीतियां बनाने में महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराते हैं।

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