“शिव शिष्यता की पृष्ठभूमि, व्याप्ति एवं प्रयोजन” विषयक पर कार्यशाला का आयोजन

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Eksandeshlive Desk

रांची : शिव शिष्य परिवार के तत्त्वावधान में “शिव शिष्यता की पृष्ठभूमि, व्याप्ति एवं प्रयोजन” विषयक दो दिवसीय कार्यशाला अग्रसेन भवन रांची में आयोजित की गई। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान से हुई उसके बाद महागुरु महादेव सहित साहब श्री हरीन्द्रानंद एवं दीदी नीलम आनंद की तस्वीर पर माल्यार्पण किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता बरखा आनन्द ने शिव शिष्यता की पृष्ठभूमि, व्याप्ति एवं प्रयोजन” विषय पर बोलते हुए कहा कि शिव शिष्यता की पृष्ठ भूमि स्वानुभूतियों की अकथ्य लंबी कहानी है। अनजाने कारणों से बाल्य काल से ही साहब श्री हरीन्द्रानंद जी अपने आसपास घटित घटनाओं को देखकर उन घटनाओं के अज्ञात सूत्रधार को जानने की प्रबल उत्सुकता कालक्रम में आपका पाथेय बन गई। आनंद ने कहा कि साहब श्री हरीन्द्रानंद जी उस अज्ञात रहस्य को जानने के निमित्त चौदह वर्षों तक अपनी सीमा में उपलब्ध शरीरी, गुरुओं, तांत्रिकों एवं अघोरों का साथ मन आपके मन को राश नहीं आया हताश मनोदशा में आपने सन 1974 में शिव को गुरु माना। कालांतर में घटनाओं का ऐसा क्रम चला जो आपके मन में उत्पन्न आध्यात्मिक आह्लाद ने अध्यात्म में आई संक्रांति से प्रत्येक व्यक्ति को मुक्त करने की अंतः प्रेरणा जगाई। प्रत्येक व्यक्ति को शिव का शिष्य होने के लिए प्रेरित करने का दृढ़ निश्चय संकल्पित होता गया। सन 1980 के दशक से शिव शिष्यता व्यापक होती चली गई।

अर्चित आनन्द ने कहा कि भारतीय संस्कृति के कण कण में भगवान शिव रचे बसे हैं। भारत की मिट्टी में,हमारे संस्कारों में शिव समाहित हैं। सर्वाधिक रूप से पूजित हैं महादेव। देश के कोने कोने में इनकी महता से ही समझा जा सकता है कि इनकी जड़ें कितनी भीतर तक हैं। आनन्द ने कहा कि भगवान शिव के बिना भारत भूमि की कल्पना ही बेमानी है। भगवान शिव भारत भूमि की मिट्टी की सुगंघ में रचे-बसे हैं तभी तो कहावत प्रचलित है ‘‘चंदा मामा सबके मामा शिव घर-घर के बाबा’’। शिव हमारी विरासत हैं। इतिहास को देखा जाए तो हमे पता चलेगा कि महादेव एक कल्पना नहीं अपितु एक सोच है, हमारी सोच हैं शिव। आनन्द ने कहा कि यही शिव गुरु का काम भी करते हैं। आज से नही बल्कि सदियों से। शिव शिष्य परिवार के सचिव अभिनव आनन्द ने कहा कि गुरु शिव की दया ही वास्तविक दीक्षा है। और अपने गुरु के प्रति कृतज्ञ होना ही गुरु दक्षिणा है। इस कार्यशाला में अन्य वक्ताओं ने मुख्य रूप से अपने विचार प्रकट किए साथ ही विभिन्न स्थानों से आए लोगों ने भी अपने-अपने विचार दिए। कार्यक्रम को सफल बनाने में राजेश, गौतम शिवकुमार विश्वकर्मा, रजनीश, रणधीर, आदित्य आदि ने महती भूमिका निभाई। कार्यशाला में भारत के विभिन्न प्रांत से आए लगभग 550 लोगों ने भाग लिया।

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