NUTAN
लोहरदगा: भारत आर्यों की पुण्यभूमि, सनातन संस्कृति की जननी और विश्व सभ्यता का मूल केंद्र रहा है।” बिहार के गया जिले में खुदाई के दौरान प्राप्त पालकालीन दुर्लभ ‘पंचायतन शिवलिंग’ की ऐतिहासिक खोज भारतीय सनातन परंपरा, वैदिक संस्कृति और आर्य सभ्यता की प्राचीनता को पुनः प्रमाणित करती है। यह खोज केवल एक पुरातात्विक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की उस गौरवशाली आध्यात्मिक विरासत का जीवंत साक्ष्य है, जिसने हजारों वर्षों तक पूरे विश्व को ज्ञान, धर्म और संस्कृति का मार्ग दिखाया। ज्योतिर्विद रामाधार पाठक ने कहा कि भारत को “आर्यों की भूमि” यूँ ही नहीं कहा जाता। वेद, उपनिषद, ज्योतिष, आयुर्वेद, योग और सनातन दर्शन इसी भूमि की देन हैं। आज भी जब धरती की खुदाई में ऐसे दुर्लभ शिवलिंग, मंदिर अवशेष और प्राचीन मूर्तियाँ निकलती हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत की सभ्यता किसी बाहरी प्रभाव की मोहताज नहीं रही, बल्कि विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में अग्रणी रही है।
उन्होंने कहा कि पंचायतन परंपरा आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित सनातन उपासना पद्धति का प्रमुख स्वरूप रही है, जिसमें शिव, विष्णु, सूर्य, शक्ति और गणेश की संयुक्त आराधना की जाती है। गया में मिला यह शिवलिंग उस कालखंड की धार्मिक समृद्धि, स्थापत्य कला और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत प्रमाण है। रामाधार पाठक ने केंद्र एवं राज्य सरकार से मांग की कि इस ऐतिहासिक धरोहर को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा देकर इसकी वैज्ञानिक जांच, संरक्षण और व्यापक शोध कराया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों और गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सकें। उन्होंने यह भी कहा कि दुर्भाग्यवश आज कुछ लोग भारत की सनातन संस्कृति और आर्य परंपरा को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, जबकि धरती के गर्भ से निकल रहे ऐसे प्रमाण स्वयं सच्चाई बयान कर रहे हैं कि भारत सदियों से धर्म, ज्ञान और अध्यात्म का विश्वगुरु रहा है। “जिस भूमि पर वेदों की ऋचाएँ गूंजी हों, जहाँ शिव और सनातन संस्कृति के प्रमाण हर युग में मिलते हों। वह भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता की आत्मा है।”
