Eksandeshlive Desk
पश्चिमी सिंहभूम : पश्चिमी सिंहभूम जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने चिकित्सकीय लापरवाही के एक मामले में चाईबासा स्थित आशा नर्सिंग होम के संचालक एवं सामान्य शल्य चिकित्सक डॉ. अरुण कुमार को शिकायतकर्ता सत्यनारायण बोइपाई को कुल 11 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि उपचार के दौरान अपेक्षित चिकित्सकीय मानकों और निर्धारित प्रक्रियाओं का समुचित पालन नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मरीज की मृत्यु हुई। आयोग ने डॉ. अरुण कुमार को मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न एवं क्षति के एवज में 10 लाख रुपये तथा वाद व्यय के रूप में एक लाख रुपये, यानी कुल 11 लाख रुपये 45 दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है। आदेश में यह भी कहा गया है कि निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने पर पूरी राशि पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा।
यह फैसला आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह और महिला सदस्य देवश्री चौधरी ने बहुमत से सुनाया। हालांकि आयोग के पुरुष सदस्य ने अलग मत व्यक्त करते हुए शिकायत को खारिज करने की राय दी, लेकिन बहुमत का निर्णय ही अंतिम माना गया। मामला ओडिशा के मयूरभंज जिले के देवगाम निवासी सत्यनारायण बोइपाई की ओर से दायर परिवाद से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के अनुसार उनकी पत्नी सुनीता देवगम को 11 जून 2024 को प्रसव पीड़ा होने पर आशा नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि वहां विशेषज्ञ स्त्री रोग चिकित्सक, प्रशिक्षित नर्स और आवश्यक चिकित्सकीय सुविधाओं के अभाव में शल्य क्रिया की गई। शल्य क्रिया के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने से उनकी स्थिति गंभीर हो गई। बाद में उन्हें टाटा मुख्य अस्पताल, जमशेदपुर और फिर राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स), रांची रेफर किया गया, जहां 17 जून 2024 को उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। सुनवाई के दौरान डॉ. अरुण कुमार ने सभी आरोपों का खंडन किया। उनका कहना था कि मरीज पहले से ही अत्यंत गंभीर और उच्च जोखिम वाली अवस्था में थी। उन्होंने आयोग को बताया कि अपरा (प्लेसेंटा) के समय से पहले अलग हो जाने जैसी गंभीर जटिलता के कारण तत्काल शल्य प्रसव आवश्यक था। उनके अनुसार ऑपरेशन सफल रहा और स्वस्थ शिशु का जन्म हुआ, लेकिन बाद में संक्रमणजनित आघात (सेप्टिक शॉक), बहु-अंग विफलता (मल्टी ऑर्गन फेल्योर) तथा रक्त के थक्के बनने की गंभीर गड़बड़ी जैसी जटिलताओं के कारण मरीज की स्थिति बिगड़ती चली गई। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने आयोग के समक्ष मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए। शिकायतकर्ता की ओर से परिजनों के शपथपत्र और अन्य दस्तावेज दाखिल किए गए, जबकि बचाव पक्ष की ओर से डॉ. अरुण कुमार, वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एस.एल. कुंकल तथा नर्सिंग होम के एक कर्मचारी के बयान दर्ज कराए गए।
आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह और महिला सदस्य देवश्री चौधरी ने अपने निर्णय में कहा कि शिकायतकर्ता स्वतंत्र विशेषज्ञ चिकित्सक की राय प्रस्तुत नहीं कर सका, लेकिन उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और पूरे घटनाक्रम के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि उपचार के दौरान अपेक्षित चिकित्सकीय मानकों का समुचित पालन नहीं किया गया। आयोग ने इसे सेवा में कमी और चिकित्सकीय लापरवाही मानते हुए शिकायतकर्ता के पक्ष में मुआवजा देने का आदेश पारित किया। वहीं आयोग के पुरुष सदस्य ने अपने असहमति मत में कहा कि केवल शल्य क्रिया के बाद मरीज की मृत्यु हो जाना चिकित्सकीय लापरवाही का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उन्होंने सिविल सर्जन की जांच रिपोर्ट, रिम्स की विशेषज्ञ समिति की राय तथा उपलब्ध चिकित्सकीय अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा कि मरीज का उपचार परिस्थितियों के अनुरूप किया गया था और चिकित्सकीय लापरवाही सिद्ध नहीं होती। हालांकि आयोग में मतभेद होने के बावजूद अध्यक्ष और महिला सदस्य के बहुमत वाले निर्णय के आधार पर शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई और शिकायतकर्ता सत्यनारायण बोइपाई को कुल 11 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश पारित किया गया।
