Eksandeshlive Desk
रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने गोड्डा-पीरपैंती नई ब्रॉडगेज रेल लाइन परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण से संबंधित 9 दिसंबर 2025 की अधिसूचना को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि रेलवे अधिनियम की धारा 20-डी के तहत निर्धारित 30 दिनों की अवधि के भीतर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष विधिवत आपत्ति दर्ज की गई थी। अदालत ने रेल लाइन का एलाइनमेंट बदलने का निर्देश देने से भी इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने अशोक कुमार साह एवं अन्य की ओर से दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में 9 दिसंबर 2025 को जारी भूमि अधिग्रहण संबंधी अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि गोड्डा जिले के मेहरमा प्रखंड के ग्रामीणों की जमीन प्रस्तावित रेल परियोजना के लिए अधिग्रहित की जा रही है। याचिकाकर्ताओं ने ग्रामीणों की आपत्तियों पर विचार करने के साथ एसआरटी कॉलेज, धमरी के पास प्रस्तावित रेल लाइन के एलाइनमेंट को करीब 400 से 750 मीटर पूर्व की ओर स्थानांतरित करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि इससे कम आबादी प्रभावित होगी।
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि 9 दिसंबर 2025 की अधिसूचना रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 20-ई के तहत जारी की गई थी। इससे पहले 29 अगस्त 2025 को धारा 20-ए के तहत भूमि अधिग्रहण की मंशा से संबंधित अधिसूचना जारी की गई थी, जिसे स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित कराया गया था। अदालत ने कहा कि कानून के तहत संबंधित व्यक्ति को धारा 20-ए की अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से 30 दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष लिखित आपत्ति दाखिल करनी थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं की ओर से रिकॉर्ड पर रखी गई आपत्तियों पर कोई तारीख अंकित नहीं थी। खंडपीठ ने कहा कि ये आपत्तियां गोड्डा के उपायुक्त को संबोधित थीं और कई अधिकारियों को उनकी प्रतियां दी गई थीं, लेकिन ऐसा कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है कि आपत्तियां उस सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दाखिल की गई थीं, जिसका उल्लेख 9 दिसंबर की अधिसूचना में किया गया था। अदालत ने यह भी कहा कि याचिका में स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया है कि संबंधित आपत्तियां 29 अगस्त 2025 की धारा 20-ए के तहत जारी अधिसूचना के प्रकाशन के बाद और उसके अनुपालन में निर्धारित अवधि के भीतर दाखिल की गई थीं। ऐसे में केवल यह आरोप कि आपत्तियों पर विचार नहीं किया गया, भूमि अधिग्रहण संबंधी अधिसूचना को रद्द करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
रेल लाइन के एलाइनमेंट में बदलाव की मांग पर अदालत ने कहा कि सामान्य तौर पर रेलवे लाइन का एलाइनमेंट निर्धारित करना विशेषज्ञों का विषय है। इस संबंध में न्यायिक समीक्षा का दायरा भी सीमित है। इसलिए अदालत रेलवे अधिकारियों को एलाइनमेंट बदलने का निर्देश नहीं दे सकती। हालांकि, खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका खारिज किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि रेलवे अधिकारी ग्रामीणों की ओर से एलाइनमेंट में बदलाव के अनुरोध पर विचार नहीं कर सकते। यदि रेलवे के स्तर पर ऐसा बदलाव व्यावहारिक और उचित पाया जाता है तो संबंधित अधिकारी उस पर विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं। अदालत ने साथ ही स्पष्ट किया कि उसने रेलवे अधिकारियों को एलाइनमेंट बदलने का कोई निर्देश नहीं दिया है।
