युवा वकीलों को एनयूएसआरएल में मिली ट्रेनिंग, 8 मई से शुरू होगा ट्रेनिंग का तीसरा चरण

News by sunil

रांची : नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ, रांची में 10 से 12 अप्रैल 2026 तक तीन दिवसीय कंटीन्यूअस लीगल एजुकेशन (CLE) कार्यक्रम सफलतापूर्वक आयोजित किया गया। 8 मई से ट्रेनिंग के तीसरे चरण की शुरुआत होगी जो तीन दिनों तक चलेगी। इस कार्यक्रम में झारखंड के विभिन्न जिलों से 5 वर्ष से कम अनुभव वाले युवा अधिवक्ताओं ने भाग लिया, जिनका उद्देश्य सीखना और कौशल विकास था।

यह कार्यक्रम CLE के बैच 1 के चरण 2 का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य व्यावहारिक शिक्षण पद्धतियों के माध्यम से युवा विधि पेशेवरों के व्यावहारिक ज्ञान को सुदृढ़ करना था। प्रतिभागियों को केस-आधारित चर्चा, ड्राफ्टिंग अभ्यास तथा इंटरैक्टिव समस्या-समाधान सत्रों के माध्यम से प्रशिक्षित किया गया, जो वास्तविक न्यायालयीन परिस्थितियों को दर्शाते हैं। उन्होंने आवेदन पत्रों एवं तर्कों की विधिक ड्राफ्टिंग पर भी कार्य किया, जिससे उन्हें न्यायालय में प्रभावी ढंग से प्रस्तुतिकरण की समझ विकसित हुई।
कार्यक्रम के दौरान कई प्रतिष्ठित वक्ताओं ने अपने सत्र प्रस्तुत किए। डॉ. जूलियन सील पसारी, (असिस्टेंस प्रोफेसर इन लॉ) ने व्यावहारिक आपराधिक प्रक्रिया पर चर्चा की। डॉ. श्रीमांशु कुमार दास, (असिस्टेंस प्रोफेसर इन लॉ एवं अंडरट्रायल प्रिज़नर्स प्रोजेक्ट प्रमुख), ने न्याय वितरण प्रणाली पर प्रतिभागियों को संबोधित किया। तथा डॉ. कौशिक बागची, (असिस्टेंस प्रोफेसर इन लॉ एवं कंटीन्यूअस लीगल एजुकेशन परियोजना प्रमुख) ने CPC के अनुसार प्लैंट्स के आवश्यक तत्वों पर चर्चा की। डॉ. अविनाश, (असिस्टेंस प्रोफेसर इन लॉ), ने भी महत्वपूर्ण विधिक जानकारी साझा की।

एक महत्वपूर्ण सत्र अधिवक्ता रीचा संचिता द्वारा लिया गया, जो झारखंड उच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और 23 वर्षों का अनुभव रखती हैं, साथ ही भारत निर्वाचन आयोग की स्थायी अधिवक्ता भी हैं। उन्होंने “अधिवक्ता–मुवक्किल संबंध” विषय पर प्रकाश डाला और बताया कि यह विश्वास निर्माण और प्रभावी विधिक अभ्यास में कितना महत्वपूर्ण है। व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए अधिवक्ता शैलेश पोद्दार, जो झारखंड उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालयों में प्रैक्टिस करते हैं तथा लॉ एंड इक्विटी फाउंडेशन से जुड़े हैं, ने विधिक सहायता प्रणाली में अधिवक्ताओं की भूमिका और न्याय तक पहुंच के महत्व पर चर्चा की।

सत्रों में व्यावहारिक आपराधिक प्रक्रिया, अस्थायी निषेधाज्ञा, त्वरित न्याय, न्याय वितरण, अधिवक्ता–मुवक्किल संबंध तथा विधिक सहायता जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया। सभी सत्र संवादात्मक रहे और प्रतिभागियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

विशेष व्याख्यान श्री प्रशांत पल्लव, वरिष्ठ अधिवक्ता, झारखंड उच्च न्यायालय एवं भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल द्वारा “भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 2013 के अंतर्गत उचित मुआवजे का अधिकार” विषय पर दिया गया। उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून के महत्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट किया, विशेष रूप से निष्पक्षता, प्रभावित व्यक्तियों के अधिकार और विकास एवं न्याय के बीच संतुलन पर बल दिया।
न्यायिक पक्ष से श्री रंजीत कुमार चौधरी, सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश, ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 के अंतर्गत अस्थायी निषेधाज्ञा पर सत्र लिया और इसके न्यायालयीन व्यवहारिक उपयोग को समझाया। कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण न्याय तक पहुंच और समाज के प्रति युवा अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी पर विशेष ध्यान था, विशेषकर उन लोगों के लिए जो विधिक सहायता वहन नहीं कर सकते।

कार्यक्रम में एक विशेष प्रशिक्षण सत्र भी शामिल था, जिसमें श्री अरुण पांडेय ने प्रतिभागियों को SCC Online के प्रभावी उपयोग के बारे में मार्गदर्शन दिया। इस सत्र में केस लॉ खोज, उद्धरण विधि तथा डिजिटल विधिक डेटाबेस के कुशल उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया।
कार्यक्रम का समापन 12 अप्रैल को सभी प्रतिभागियों और वक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए किया गया। राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय, रांची के आयोजकों ने भविष्य में भी इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

प्रतिभागियों ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि इससे उन्हें विधि के व्यावहारिक पहलुओं को समझने और झारखंड भर के पेशेवरों से जुड़ने का अवसर मिला।

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