By Mustaffa
झारखंड छात्र संघ ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री और सीबीएसई अध्यक्ष को लिखा पत्र
रांची: झारखंड छात्र संघ (जेसीएस) ने सीबीएसई के स्कूली पाठ्यक्रम में उर्दू और क्षेत्रीय जनजातीय भाषाओं को तीसरी भाषा के विकल्प के रूप में शामिल करने की पुरजोर मांग की है। इस संबंध में संघ के केंद्रीय अध्यक्ष एस. अली ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और सीबीएसई के अध्यक्ष को औपचारिक पत्र लिखकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह किया है। एस. अली ने पत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के अनुच्छेद 4.12 का उल्लेख करते हुए कहा कि नई नीति बहुभाषावाद और मातृभाषा में शिक्षा पर विशेष बल देती है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत की सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित रखने के लिए छात्रों को उनकी स्थानीय और पारंपरिक भाषाओं में सीखने का अवसर मिलना चाहिए। संघ ने स्पष्ट किया कि उर्दू भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है और कई राज्यों की द्वितीय राजभाषा भी है। वहीं,संथाली,गोंडी,भीली,मुंडारी,हो और कुड़ुख जैसी जनजातीय भाषाएं हमारी अमूल्य धरोहर हैं। यूनेस्को की रिपोर्ट का हवाला देते हुए संघ ने चिंता जताई कि भारत की कई भाषाएं लुप्तप्राय हैं,जिन्हें शैक्षिक संरक्षण देकर ही बचाया जा सकता है। प्रमुख मांगें और सुझाव: कक्षा 6 से 10 तक के छात्रों के लिए उर्दू और प्रमुख जनजातीय भाषाओं को विषय कोड के साथ तीसरी भाषा के विकल्प के रूप में शामिल किया जाए। इन भाषाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों का निर्माण एनसीईआरटी के माध्यम से कराया जाए। जिन क्षेत्रों में ये भाषाएं बोली जाती हैं,वहां के सीबीएसई स्कूलों में कम से कम एक भाषा शिक्षक की नियुक्ति अनिवार्य रूप से की जाए। इन विषयों को बोर्ड परीक्षा में 100 अंकों के वैकल्पिक विषय के रूप में मान्यता दी जाए। एस. अली ने विश्वास जताया कि इस कदम से न केवल एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना मजबूत होगी,बल्कि संविधान के अनुच्छेद 29 और 350 ए के तहत भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों का भी सम्मान होगा।
