News By राजू चौहान
धनबाद। भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) के पीबी एरिया की ऐतिहासिक ‘5/6 पिट परियोजना’ एक बार फिर बंद होने की कगार पर है। कोल इंडिया के इतिहास में पहली बार निजी आॅपरेटर के साथ शुरू हुई यह महत्वाकांक्षी योजना भारी जलभराव के कारण अधर में लटक गई है। इस परियोजना के तहत कोयला खनन के लिए बीसीसीएल ने वित्तीय जोखिम से बचने के लिए नो लॉस व रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल के तहत कार्य ईगलदीप नामक कंपनी को सौंप दिया है। कंपनी ने उक्त क्षेत्र से कोयला खनन करने के लिए अपने संसाधनों सहित लगभग 800 करोड़ रुपए निवेश कर चुकी है। लेकिन विगत दो वर्षों में एकड़ा जोरिया नदी के पानी जो गोपालीचक के पास स्थित कंपनी की खदान है में माइनिंग की दरारों से खदान में प्रवेश करने से रोकने में नाकाम साबित हो रही है। फलस्वरूप खदान में पानी भर जा रहा है व कोयला खनन का कार्य रूक सा गया है। खदन में पानी भर जाने से खनन कार्य में लगे मशीनी उपकरण व अन्य संसाधन बेकार होते जा रहे हैं। ऐसे में कंपनी के निवेश का लाभ न तो स्वयं कंपनी को मिल रहा है न ही बीसीसीएल को। स्थिति ऐसी होती जा रही है कि खदान में जल भराव के कारण इसके बंद होने की स्थिति उत्पन्न होते जा रहा है।
मुख्य समस्या: 2 साल की मेहनत पर फिर रहा पानी
खदान का संचालन कर रही कंपनी ईगलदीप (ईगल इंफ्रा इंडिया लिमिटेड) के स्थानीय अधिकारी जितेंद्र कुमार सिंह ने खुलासा किया है कि कंपनी अब तक 800 करोड़ का निवेश कर चुकी है, लेकिन कोयला उत्पादन वर्तमान में ‘नगण्य’ (शून्य) है। जबकि उत्पादन लक्ष्य 2.7 एमटीपी यानि 27लाख टन प्रतिवर्ष है। एकड़ा जोरिया नदी का पानी गोपालीचक के पास स्थित माइनिंग दरारों से सीधे हमारी खदान में चला जाता है। हम साल भर जितना पानी पंप आउट करते हैं, मानसून आते ही नदी की पानी खदान को दोबारा भर देती है। हमारी करोड़ों की अत्याधुनिक मशीनें खदान में बेकार पड़ी हैं।
क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
यह खदान पहले भी इसी समस्या के कारण बंद हो चुकी है। इसका पुराना इतिहास कुछ इस प्रकार है:
1990 का दशक में बीसीसीएल ने कनाडाई कंपनी मेसर्स बीसी कोल के साथ मिलकर इसे आधुनिक हाइड्रो माइनिंग प्रोजेक्ट (एचएमपी) के रूप में शुरू किया था। 2000-2002 करोड़ों रुपये लगाने के बाद, भारी जलभराव व वाटर-लॉगिंग के कारण खदान को आखिरकार बंद करना पड़ा। 2002-2025 इस भूगर्भीय खराबी के कारण करीब 83 मिलियन टन का कीमती कोकिंग कोल रिजर्व 25 वर्षों तक लॉक रहा।
वर्तमान स्थिति व आधिकारिक रुख
बीसीसीएल ने इस बार वित्तीय जोखिम से बचने के लिए इसे ‘नो लॉस’ व रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल के तहत निजी हाथों में सौंपा था। हालांकि अनुबंध के अनुसार पानी निकालना आॅपरेटर की जिम्मेदारी है, लेकिन नदी के मार्ग को बदलना व बाहरी दरारों को ठीक करना बिना बीसीसीएल प्रबंधन, प्रशासनिक व वैज्ञानिक सहयोग के मुमकिन नहीं है। इस मामले को लेकर आॅपरेटर कंपनी ने बीसीसीएल के सीएमडी मनोज कुमार अग्रवाल को लिखित व मौखिक जानकारी दी है।
क्या होगा आगे?
झरिया जैसे संवेदनशील, आग व गैस प्रभावित क्षेत्र में बिना सटीक ड्रेनेज प्लान के काम करना आत्मघाती साबित हो सकता है। यदि बीसीसीएल प्रबंधन, सीआइएमएफआर या आईआईटी-आईएसएम जैसी स्वतंत्र वैज्ञानिक संस्थाएं तुरंत दखल देकर एकड़ा जोरिया नदी के पानी को दरारों में जाने से नहीं रोकती हैं, तो 800 करोड़ का यह निवेश ‘डूबती हुई लागत’ (संक कॉस्ट) बन जाएगा। नतीजा यह होगा कि देश को एक बार फिर महंगे कोकिंग कोल के आयात के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ेगा।
क्या कहते हैं अधिकारी
एकड़ा जोरिया नदी की दरारें व पास की दूसरी ओपेनकास्ट (खुली) खदानों के मुहानों से पानी का प्रवेश करना सचमुच एक बड़ी चुनौती बन गई है। इस समस्या पर एक व्यापक वैज्ञानिक समीक्षा (साइंटिक रिव्यू) करने के बाद तुरंत काम करने की आवश्यकता है।
जयंत कुमार दास, महाप्रबंधक (पुटकी बलिहारी क्षेत्र, बीसीसीएल)
