Eksandeshlive Desk
नई दिल्ली : अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में लगातार आ रही तेजी से भारत की अर्थव्यवस्था के बुरी तरह से प्रभावित होने का खतरा बन गया है। भारत अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात करता है। ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की कीमत में आए उछाल ने देश के खजाने पर दबाव की स्थिति बना दी है, जिससे अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतक अब प्रभावित होने लगे हैं। मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत में आई तेजी का निगेटिव असर अब दिखने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में आई तेजी से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल और डीजल की बिक्री में 22 से 28 रुपये प्रति लीटर तक के नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। ये स्थिति भी तब है, जब केंद्र सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए एक महीने पहले ही पेट्रोल पर लगने वाली 13 रुपये प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी को घटा कर तीन रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगने वाली 10 रुपये प्रति लीटर की एक्साइज ड्यूटी को शून्य कर दिया था।
एक्साइज ड्यूटी घटाने के बाद भी कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी नहीं होने से आम जनता को तो राहत मिला है, लेकिन ऑयल कंपनियों का घाटा बढ़ता जा रहा है। इसके साथ ही क्रूड इंपोर्ट बिल भी बढ़ता जा रहा है। क्रूड के इंपोर्ट बिल में बढ़ोतरी होने से भारत की अर्थव्यवस्था पर भी निगेटिव असर पड़ने की संभावना बन गई है। रेटिंग एजेंसी इक्रा के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में हुई बढ़ोतरी से भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट काफी अधिक बढ़ सकता है। इसके साथ ही इसकी वजह से फिस्कल डेफिसिट टारगेट भी बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है। प्रशांत वशिष्ठ का कहना है कि करंट अकाउंट और फिस्कल डेफिसिट के अलावा कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत भारतीय मुद्रा को भी कमजोर कर सकती है। इसी वजह से रुपया आज डॉलर की तुलना में 95.30 के स्तर से भी ज्यादा गिर कर रिकॉर्ड लो लेवल तक पहुंचा हुआ है। इसी तरह कच्चे तेल की तेजी भारत में महंगाई को बढ़ाने की एक बड़ी वजह बन सकती है। इसके साथ ही इसके कारण फॉरेन कैपिटल आउटफ्लो (विदेशी पूंजी की निकासी) भी और बढ़ सकती है। कहा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में इसी तरह की बढ़ोतरी अगर और कुछ दिन तक जारी रही तो इससे देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा, जिससे स्टॉक मार्केट में भी अनिश्चितता आ सकती है। ऐसा इसलिए होगा कि अर्थव्यवस्था की सेहत को सुधारने के लिए सरकार को सब्सिडी, इंटरेस्ट रेट और रुपया-डॉलर एक्सचेंज रेट पर पड़ने वाले असर के बारे में कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं। मार्केट एक्सपर्ट विजय राज मल्होत्रा का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत में तत्काल राहत मिलने की संभावना भी नजर नहीं आ रही है। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका की ओर बरती जा रही कड़ाई भी है। होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना रुख और सख्त कर दिया है। ट्रंप ने कहा है कि जब तक ईरान अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील नहीं करेगा, तब तक होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी जारी रहेगी। अमेरिकी नेवी होर्मुज में अपनी ब्लॉकेड जारी रखेगी। अमेरिकी नाकेबंदी की वजह से होर्मुज के रास्ते होने वाली कच्चे तेल की सप्लाई लगभग ठप पड़ गई है।
उल्लेखनीय है कि 28 फरवरी को पश्चिम एशिया में संघर्ष की शुरुआत होने के बाद ईरान ने होर्मुज के रास्ते मालवाहक जहाजों और ऑयल तथा गैसोलीन के टैंकर्स की आवा-जाही को पूरी तरह से रोक दिया था। इस रास्ते से ईरान सिर्फ अपने जहाजों को निकाल रहा था या फिर अपने मित्र देशों के जहाजों को एक-एक निकलने की अनुमति दे रहा था। ईरानी रोक के कारण इस समुद्री रास्ते से कच्चे तेल की सप्लाई लगभग ठप हो गई। ये स्थिति तब और खराब हो गई, जब अप्रैल महीने में अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी करने का ऐलान किया और जहाजों की आवा-जाही पूरी तरह से रोक दी। उसके बाद से ही न तो अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का दूसरा दौर शुरू हो सका है और न ही होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवा-जाही सुचारू रूप से शुरू हो सकी है। होर्मुज स्ट्रेट ठप पड़ जाने से खाड़ी देशों द्वारा दुनिया के ज्यादातर देशों को की जाने वाली कच्चे तेल की सप्लाई भी लगभग ठप पड़ी हुई है, क्योंकि खाड़ी के देश ज्यादातर इसी समुद्री रास्ते से कच्चे तेल की सप्लाई करते हैं। पूरी दुनिया में होने वाली कच्चे तेल और गैस आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा हॉर्मुज स्ट्रेट के जरिये होता है, लेकिन पश्चिम एशिया में जारी जंग के कारण इसके लगभग ठप पड़ जाने से दुनिया भर में उथल-पुथल मच गई है और कच्चे तेल की कीमत में जबरदस्त उछाल आ गया है। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमत में 55 से 60 प्रतिशत तक की तेजी आ गई है।
