नौ साल सात माह बाद घर लौटा पूर्व माओवादी कान्हू मुंडा, जंगल की बंदूक से लोकतंत्र की राह तक

360°

पूर्व माओवादी जोनल सचिव की घर वापसी पर भावुक हुआ परिवार, युवाओं से हिंसा छोड़ लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास की अपील

Eksandeshlive Desk

पूर्वी सिंहभूम: करीब नौ साल सात माह का लंबा इंतजार शनिवार को उस समय खत्म हुआ, जब भाकपा माओवादी के पूर्व जोनल सचिव कान्हू मुंडा जेल से रिहा होकर अपने पैतृक गांव गुड़ाबांदा प्रखंड के जियान स्थित बनगोड़ा टोला पहुंचा। वर्षों बाद गांव की पगडंडी पर कदम रखते ही उसके सामने बीते जीवन की कई तस्वीरें जैसे एक साथ लौट आईं। घर के दरवाजे पर पत्नी वैशाखी मुंडा, बच्चे और माता-पिता उसका इंतजार कर रहे थे। लंबे अंतराल के बाद अपने परिजन को सामने देखकर परिवार की आंखें खुशी से भर आईं। कान्हू के गांव पहुंचने के दौरान गुड़ाबांदा थाना प्रभारी सुमित कुमार के नेतृत्व में पुलिस सुरक्षा भी मौजूद रही। पुलिसकर्मी उसे सुरक्षित उसके घर तक लेकर पहुंचे। घर पहुंचने पर परिजनों ने पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ उसका स्वागत किया। एक ओर परिवार के लिए यह लंबे इंतजार के खत्म होने का दिन था, तो दूसरी ओर कान्हू के लिए यह उस जीवन में लौटने का अवसर था, जिससे वह वर्षों पहले दूर चला गया था।

2017 में हथियारों के साथ किया था आत्मसमर्पण: कान्हू मुंडा ने 15 फरवरी 2017 को अपने सात साथियों और हथियारों के साथ तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) अनूप टी. मैथ्यू के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। आत्मसमर्पण के बाद उसके जीवन का बड़ा हिस्सा अलग-अलग जेलों में बीता। सबसे पहले उसे घाटशिला जेल में रखा गया। इसके बाद जमशेदपुर के घाघीडीह जेल, हजारीबाग केंद्रीय कारा और फिर पश्चिम बंगाल की पुरूलिया जेल में उसने लंबा समय बिताया। एक जेल से दूसरी जेल तक स्थानांतरण के बीच कान्हू का परिवार उससे दूर रहा और गांव में उसके लौटने का इंतजार बना रहा। करीब एक दशक बाद शनिवार को वह इंतजार खत्म हुआ। पुरूलिया न्यायालय में उसके खिलाफ चल रहे अंतिम मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद उसे जमानत मिली और रिहाई का रास्ता साफ हुआ। जेल से बाहर निकलने के बाद कान्हू सीधे अपने गांव की ओर रवाना हुआ।

35 मामलों में अधिकांश से हो चुका है बरी: कान्हू के अनुसार, उसके खिलाफ अलग-अलग थानों में कई मामले दर्ज थे। इनमें से कुछ मामलों में पुलिस की ओर से पुनः अनुसंधान किए जाने के बाद उसका नाम हटा दिया गया। शेष 35 मामलों में भी अधिकांश में साक्ष्य के अभाव में वह बरी हो चुका है। उसके अनुसार, वर्तमान में दो मामलों में उसे जमानत मिली है। इनमें मुसाबनी में नागरिक सुरक्षा समिति के अध्यक्ष धनाई किस्कू हत्याकांड और पश्चिम बंगाल के पुरूलिया का एक मामला शामिल है। पुरूलिया मामले में जमानत मिलने के बाद ही उसकी जेल से रिहाई संभव हो सकी। लंबे समय बाद गांव लौटे कान्हू के विचारों में भी बदलाव दिखाई दिया। कभी माओवादी संगठन से जुड़े रहे कान्हू ने अब क्षेत्र और समाज में बदलाव के लिए बंदूक और हिंसा के बजाय लोकतांत्रिक व्यवस्था को जरूरी बताया। उसने कहा कि समय बदल चुका है। समाज और क्षेत्र में परिवर्तन बंदूक के बल पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और मतदान के माध्यम से ही संभव है। उसने युवाओं से भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखने और इसी माध्यम से अपने भविष्य तथा समाज के विकास में भागीदारी निभाने की अपील की। कान्हू का यह बदलाव उसके जीवन के लंबे और कठिन दौर के बाद सामने आया है। वर्षों तक जेल में रहने के बाद जब वह गांव लौटा तो उसके सामने अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन की नई शुरुआत करने की चुनौती भी है।

परिवार ने संभालकर रखा इंतजार: कान्हू के परिवार ने उसके जेल में रहने के वर्षों को अपने तरीके से जिया। उसकी दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी चेन्नई में शिक्षिका के रूप में कार्यरत है। छोटी बेटी और बेटा स्नातक की पढ़ाई पूरी कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। पिता के लंबे समय तक घर से दूर रहने के बावजूद बच्चों ने अपनी पढ़ाई और करियर की राह जारी रखी। अब जब कान्हू वापस घर पहुंचा है तो परिवार के लिए यह केवल एक सदस्य की वापसी नहीं, बल्कि वर्षों से अधूरे पड़े पारिवारिक जीवन के फिर से जुड़ने का अवसर है। कान्हू ने गांव लौटने के बाद अब सामान्य जीवन जीने की इच्छा जताई है। करीब एक दशक जेल में बिताने के बाद वह परिवार के बीच रहकर नए सिरे से जीवन शुरू करना चाहता है। उसके लिए गांव की वही जमीन, घर और परिवार अब नए अर्थों में सामने हैं। जियान के बनगोड़ा टोला में शनिवार को उसका पहुंचना इसलिए भी खास रहा कि यहां उसका स्वागत किसी राजनीतिक या संगठनात्मक कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि एक परिवार द्वारा लंबे समय बाद अपने सदस्य की वापसी के रूप में हुआ। पत्नी, बच्चों और माता-पिता के चेहरे पर खुशी इस वापसी की सबसे बड़ी तस्वीर बनी। एक समय संगठन और हथियारों की दुनिया से जुड़े रहे कान्हू के मुंह से अब लोकतंत्र और मतदान की बात सुनना उसके जीवन में आए बदलाव को भी रेखांकित करता है। नौ साल सात माह बाद घर लौटे कान्हू के सामने अब अतीत से अलग एक नई राह है, परिवार के साथ सामान्य जीवन जीने और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी भूमिका तलाशने की राह।

Spread the love