इमाम हुसैन की कुर्बानी इंसानियत, अमन और हक की बुलंदी का पैगाम है : मौलाना सैयद तहज़ीबुल हसन रिज़वी
Eksandeshlive Desk
रांची : मुहर्रम के अवसर पर पूरी दुनिया की तरह रांची में भी हज़रत इमाम हुसैन और शोहदा-ए-कर्बला की याद में अंजुमन जाफरिया के तत्वावधान में भव्य जुलूस-ए-आशूर निकाला गया। यह जुलूस मस्जिद जाफरिया से बरामद हुआ, जिसमें हजारों अज़ादारों ने अकीदत और एहतराम के साथ हिस्सा लिया। जुलूस से पूर्व मस्जिद जाफरिया में नमाज़-ए-जुमा अदा की गई। नमाज़ के बाद आयोजित मजलिस-ए-आशूर को संबोधित करते हुए ख़तीब-ए-इंक़लाब मौलाना सैयद तहज़ीबुल हसन रिज़वी ने कहा कि हज़रत इमाम हुसैन की शहादत की याद मनाने में मज़हब, मसलक या फिरके की कोई दीवार नहीं है। हर इंसाफ़पसंद और इंसानियत से मोहब्बत करने वाला व्यक्ति इमाम हुसैन की अज़ीम कुर्बानी को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन की शहादत ज़ुल्म के खिलाफ हक, इंसाफ और इंसानियत की जीत का प्रतीक है। वाक़या-ए-कर्बला हमें यह संदेश देता है कि किसी भी हाल में अन्याय और अत्याचार के सामने झुकना नहीं चाहिए। यज़ीद अपनी विशाल सेना के बावजूद हक को परास्त नहीं कर सका, जबकि इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने अल्लाह पर भरोसा रखते हुए सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी और हमेशा के लिए अमर हो गए। मौलाना रिज़वी ने कहा कि इस्लाम में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं है। मुहर्रम हमें अमन, भाईचारा, त्याग और वतन से मोहब्बत का पैगाम देता है। उन्होंने कहा कि देश के प्रति वफादारी भी एक बड़ी इबादत है। हमें संकल्प लेना चाहिए कि देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए हमेशा एकजुट रहेंगे तथा देश के दुश्मनों को कभी सफल नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि भारत गंगा-जमुनी तहज़ीब, धार्मिक सहिष्णुता और आपसी भाईचारे की मिसाल है। यही कारण है कि यह देश हमेशा प्रेम, सौहार्द और एकता का संदेश देता रहा है।
नौहाख़्वानी, मातम और जगह-जगह स्वागत शिविर : मजलिस के बाद ताबूत, अलम और झूला निकाला गया। विक्रांत चौक पर अज़ादारों ने पुरसोज़ नौहाख़्वानी और सीना-ज़नी की। इसके बाद जुलूस अपने पारंपरिक मार्गों से होते हुए टैक्सी स्टैंड पहुंचा, जहां सेंट्रल मुहर्रम कमेटी, जिला प्रशासन, श्री महावीर मंडल, मरहबा ह्यूमन सोसाइटी, अंजुमन इस्लामिया रांची, मॉर्निंग ग्रुप, इमाम बख्श अखाड़ा, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा सहित विभिन्न सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने जुलूस-ए-हुसैनी का गर्मजोशी से स्वागत किया। मार्ग में विभिन्न स्थानों पर स्वागत शिविर लगाए गए, जहां अज़ादारों के लिए पेयजल एवं अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की गई। इस अवसर पर मौलाना सैयद तहज़ीबुल हसन रिज़वी ने शिया समुदाय की ओर से सभी अतिथियों, सामाजिक संगठनों, जिला प्रशासन और आम लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि हम सभी को आपसी एकता, भाईचारे और राष्ट्रीय एकजुटता के साथ अपने देश और राज्य को मजबूत बनाने के लिए मिलकर कार्य करना चाहिए। इसके बाद जंजीरी मातम किया गया, जिसमें अज़ादारों ने हज़रत इमाम हुसैन की याद में अपने गम और अकीदत का इज़हार किया। जुलूस में मशहूर नौहाख़्वान अमीर गोपालपुरी, कासिम अली और असगर अली ने संयुक्त रूप से नौहाख़्वानी की, जबकि अंजुमन जाफरिया के मातमी दस्ते ने पूरे जुलूस का अनुशासित ढंग से नेतृत्व किया। इस अवसर पर सैयद शाहरुख हसन रिज़वी, जसीम रिज़वी, नदीम रिज़वी, अशरफ हुसैन रिज़वी, डॉ. मुबारक अब्बास, एस.एच. फ़ातमी, इक़बाल फ़ातमी, सैयद फ़राज़ अब्बास, अकीलुर रहमान, मोहम्मद इस्लाम, मोहम्मद आफ़ताब, मोहम्मद महजूद, मोहम्मद तौहीद, सुहैल सईद, तारिक इमरान, सैयद निहाल अहमद, सागर कुमार, जेय सिंह यादव, सागर वर्मा, अब्दुल ख़ालिक नन्नू, हाजी माशूक, अब्दुल मन्नान, सैफ़ुल हक़, आलोक कुमार दुबे, आदिल ज़हीर, जावेद शहजाद, शमशेर आलम, महबूब आलम, सरवर खान, सज्जाद इदरीसी, पप्पू गद्दी, सहित सैकड़ों लोग मौजूद थे।
वतन परस्ती का पैगाम देता नौहा : मशहूर नौहाख़्वान अमीर गोपालपुरी ने वतन से मोहब्बत पर आधारित एक विशेष नौहा पेश किया। उन्होंने पढ़ा—”मेरा हिंदुस्तान है, ये मेरा हिंदुस्तान, इस पे दिल कुर्बान, इस पे जान भी कुर्बान। अपने वतन से करना मोहब्बत, ये फरमान-ए-मोहम्मद है, जहां की खाओ, वहीं की गाओ, ये ऐलान-ए-मोहम्मद है। दहशतगर्दी करने वाला सबसे बड़ा शैतान है, मेरा हिंदुस्तान है, ये मेरा हिंदुस्तान है।
