सामाजिक बहिष्कार के बाद किरण उरांव ने फिर अपनाया ‘सरना धर्म’

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News by Mustaffa

​मेसरा (राँची) : अपनी संस्कृति और समाज से कटकर व्यक्ति कितना एकाकी हो जाता है,इसका जीवंत उदाहरण ओरमांझी के मधुकमा गाँव में देखने को मिला। यहाँ की निवासी किरण उरांव ने 10 वर्ष पूर्व ईसाई धर्म अपनाने के बाद,पुनः अपने मूल ‘सरना धर्म’ में वापसी की घोषणा की है। ​किरण उरांव ने 22 पड़हा सरना समिति के अध्यक्ष बाबूलाल महली को सौंपे आवेदन में अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि 10 वर्ष पूर्व बीमारी के दौरान बहकावे में आकर उन्होंने धर्म बदला था। इस निर्णय के कारण समाज और रिश्तेदारों ने उनसे पूरी तरह दूरी बना ली थी। अब अपने पुत्र के विवाह (25 अप्रैल) को सामाजिक रीति-रिवाजों और पाहन-पुजारी के सानिध्य में संपन्न कराने हेतु उन्होंने यह साहसी कदम उठाया है। ​किरण की वापसी को पूर्णतः जनजातीय मर्यादाओं के साथ संपन्न किया गया। इस अवसर पर जनजातीय रीति-रिवाजों के अनुसार मुर्गे की बलि दी गई और पारंपरिक विधि-विधान से उन्हें पुनः सरना धर्म की मुख्यधारा में शामिल किया गया। ​इस कार्यक्रम के दौरान 22 पड़हा सरना समिति के अध्यक्ष बाबूलाल महली ने धर्म और संस्कृति के प्रति लोगों को जागरूक करते हुए प्रेरणादायक बातें रखीं। उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही समाज सशक्त रह सकता है। ​वहीं,जिला परिषद सदस्य कमिश्नर मुंडा ने किरण उरांव का स्वागत करते हुए कड़ा संदेश दिया। उन्होंने अपने बयान में कहा,आदिवासी पहचान उसकी रूढ़िवादी परंपराओं और पूर्वजों की पद्धति में ही सुरक्षित है। बाहरी प्रभाव हमारी संस्कृति को कमजोर करते हैं। किरण का यह निर्णय न केवल उनके परिवार के लिए,बल्कि पूरे समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश है। ​किरण के इस निर्णय को पूरे गाँव का समर्थन मिला। उनकी इस ‘घर वापसी’ की गवाही के रूप में सुषमा उरांव,सुनील उरांव,दिनेश उरांव,दीपक उरांव,घोको देवी और प्रमिला उरांव सहित दर्जनों ग्रामीणों ने हस्ताक्षर कर उन्हें समाज में पुनः स्थान दिया। अंत में किरण उरांव ने संकल्प लिया कि वे अब आजीवन अपनी जड़ों के साथ रहेंगी और सरना समाज के नियमों का पालन करेंगी।

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