रिपोर्ट / अशोक अनन्त
चतरा । बिहार में दस्तावेजों ने पहुंचाया था पार्षद की कुर्सी तक संकट,अब चतरा में दस्तावेजों पर टिकी नगर अध्यक्ष की सियासी किस्मत। नगर परिषद चतरा के नगर अध्यक्ष अताउर्रहमान के बेटे से जुड़े बच्चों के दस्तावेजों को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। नगर परिषद चुनाव के दौरान बच्चों से संबंधित प्रस्तुत किए गए दस्तावेज अब सवालों के घेरे में हैं। मामला केवल दस्तावेजों की जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि यदि जांच में नियमों के विपरीत तथ्य सामने आते हैं तो निर्वाचित पद की पात्रता पर भी इसका असर पड़ सकता है।मामले में दो से अधिक संतान से संबंधित प्रावधानों और चुनाव के दौरान प्रस्तुत दस्तावेजों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। अब संबंधित विभाग और सक्षम प्राधिकारी के स्तर पर दस्तावेजों एवं तथ्यों की जांच के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल इस मामले को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भी चर्चा तेज है। चतरा के इस मामले के बीच बिहार का एक पुराना प्रकरण भी चर्चा में आ गया है। बिहार के भोजपुर से जुड़ा कृष्णा जी बनाम प्रयाग यादव, वाद संख्या 20/2023 मामला बच्चों की संख्या और चुनावी दस्तावेजों से जुड़े विवाद के कारण सामने आया था। 1 अप्रैल 2026 के दैनिक अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार, तीन संतान के मामले में निर्वाचित वार्ड पार्षद की सदस्यता समाप्त किए जाने की कार्रवाई की गई थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि चुनाव के दौरान प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों में बच्चों से संबंधित जानकारी को लेकर सवाल उठे थे।मामले की सुनवाई के दौरान स्कूल प्रमाणपत्र,जन्म प्रमाणपत्र, आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेजों की जांच का भी उल्लेख किया गया था। दस्तावेजों और वास्तविक तथ्यों में अंतर सामने आने के बाद मामला निर्वाचन आयोग तक पहुंचा और निर्वाचित प्रतिनिधि की सदस्यता पर कार्रवाई हुई।बिहार का यह प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे यह साफ होता है कि चुनावी पात्रता से जुड़े दस्तावेजों में बच्चों की संख्या जैसी जानकारी महज औपचारिकता नहीं होती। यदि जांच में प्रस्तुत जानकारी गलत अथवा तथ्यों के विपरीत पाई जाती है तो मामला निर्वाचित पद की वैधता तक पहुंच सकता है।
अब चतरा में दस्तावेजों की जांच पर टिकी निगाहें
बिहार के मामले की तर्ज पर अब चतरा प्रकरण में भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव के दौरान प्रस्तुत किए गए बच्चों से संबंधित दस्तावेज वास्तविक रिकॉर्ड से मेल खाते हैं या नहीं। यदि जांच में किसी प्रकार का विरोधाभास सामने आता है तो संबंधित प्राधिकारी को लागू कानून और नियमों के तहत निर्णय लेना होगा।हालांकि, बिहार के मामले को चतरा पर सीधे लागू नहीं माना जा सकता, क्योंकि दोनों राज्यों के संबंधित कानून और चुनावी प्रावधान अलग हो सकते हैं। चतरा मामले में अंतिम स्थिति जांच, दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी। फिलहाल पूरे मामले में दस्तावेज ही सबसे अहम कड़ी बन गए हैं। अब सवाल यह नहीं कि आरोप क्या हैं, बल्कि जांच में दस्तावेज क्या साबित करते हैं। इस पर टिकी है नगर अध्यक्ष की राजनीतिक कुर्सी की अगली तस्वीर।
